बचपन से दुकानों पर लिखी दो-चार इबारतें चाहकर भी भूली नहीं जा सकतीं। जैसे-उधार प्रेम की कैंची है, आज नकद, कल उधार, नक्कालों से सावधान, आदि-आदि। दरअसल यह देश सृष्टि के प्रारंभ से ही असल और नकल के चक्कर में भीषण रूप से उलझा हुआ है। यही नहीं, कई बार तो प्रचार के बूते नकल ही असली माल को पीट देता है। वर्ण और वर्णसंकर की यह लड़ाई आज भी जारी है, भले वर्णसंकर नाम बदलकर अब जीएम हो गया हो। फिल्मों में भी असल से ज्यादा डुप्लीकेट लोकप्रिय हो गए हैं, क्योंकि वे सस्ते और सुलभ हैं। सीडी और मोबाइल का बाजार तो इन्हीं लोकल मार्काओं ने हथिया लिया है। चीनी माल इसीलिए इंडिया पर भारी है। चार सौ बीसी अब अपराध से ज्यादा चतुराई का पर्याय हो गई है। नटवर नागर कन्हैया जी नटवरलाल से पिट गए हैं।
वैसे तो नकल हमारी फितरत में है, लेकिन परीक्षा के दिनों में नकल की चर्चा कुछ ज्यादा ही होने लगती है। पुराने जमाने के थर्ड क्लास फर्स्ट पोजीशन यह मानने को ही तैयार ही नहीं कि अब फर्स्ट क्लास टोकरियों में बंटने लगी है। अब उन्हें कौन समझाए कि जेब में माल हो, तो किसी भी नौकरी का सपना देखा जा सकता है। जितना लगाओ, उतना पाओ। फिर अब तनख्वाह नहीं, पैकेज और ऊपरी आमदनी का महत्व है, जिसे शर्म से नहीं, शान से बताया जाता है। पहले नकलची होना शर्म की बात होती होगी, पर आज शान से घर के विदेशी सामान की खूबियां बखान की जाती हैं।
नकल में बिहार और उत्तर प्रदेश एक दूसरे से होड़ करते दिखते हैं। कभी परीक्षा से पहले खबर आती है कि बिहार के हजारों छात्र नकल के भरोसे उत्तर प्रदेश पहुंच रहे हैं। लेकिन बिहार में परीक्षा के दौरान नकल कराने वालों की प्रतिबद्धता की अखबारों में छपी तस्वीर बताती है कि उत्तर प्रदेश इस जज्बे में अभी बहुत पीछे है। यह अलग बात है कि इस नकल के कारण हिंदी प्रदेशों की शिक्षा का भट्ठा बैठ गया है। लेकिन शिक्षा की चिंता कौन करता है, बस आपको पैसे बनाने की कला आनी चाहिए।