चुनावी महासमर आधे से ज्यादा गुजर चुका है, लेकिन बाकी बची सीटों की अहमियत पहल से कहीं ज्यादा बढ़ गई है। दरअसल, एक-एक सीट 16 मई के बाद सत्ता तक पहुंचने की कोशिश में जुटे तमाम राजनीतिक दलों के लिए बेहद कीमती हो चली है।
196 सीटों पर अभी वोटिंग होनी बाकी है, ऐसे में कांग्रेस अपनी तरफ से पूरा जोर तो लगा ही रही है, साथ ही चुनाव बाद बनने वाले समीकरण में मोदी को रोकने के लिए तमाम रणनीतियों पर विचार कर रही है।
कांग्रेस मोदी की अगुवाई में एनडीए की सरकार बनने से रोकने के लिए एक ऐसा दांव लगाने की तैयारी कर रही है, जिसकी सुगबुगाहट अब तक नहीं मिली थी। वो किसी भी तरह दुश्मन को हराने के लिए गठबंधन की अगुवा वाली कुर्सी छोड़ने तक को तैयार हो गई है।
चुनाव बाद क्या करेगी कांग्रेस?
टीओआई के मुताबिक भाजपा अगले प्रधानमंत्री के रूप के नरेंद्र मोदी को पेश कर रही है और कांग्रेस के लिए फिलहाल काफी मुश्किलें दिख रही हैं। लेकिन चुनाव बाद यह समीकरण बदल सकता है।
अगर ऐसा हुआ, तो कांग्रेस हारने के बावजूद जीत सकती है और जीत तक पहुंचने के बावजूद भाजपा के मुंह से निवाला दूर रह सकता है। कांग्रेस इन दिनों गैर-एनडीए गठबंधन को बाहर से समर्थन देने या उसमें शामिल होने से भी गुरेज नहीं दिखाएगी।
हालांकि, कांग्रेस का यह आकलन काफी अंदाजों पर टिका है। उसका मानना है कि अगर मोदी एनडीए को 272 के करीब नहीं ले जा पाते और वो 220-230 पर अटक जाता है, तो कांग्रेस का कमाल दिखेगा।
कांग्रेस 120 सीट तक पहुंची, तो मोदी रुकेंगे?
सत्तारूढ़ दल का आकलन है कि भले अभी यह माना जा रहा है कि क्षेत्रीय दलों और कांग्रेस में भारी गिरावट आने से भाजपा और उसके सहयोगियों को काफी बल मिलेगा। लेकिन जमीनी हकीकत यह नहीं है।
कांग्रेस के रणनीतिकारों का मानना है कि अगर एनडीए का प्रदर्शन हल्का रहता है और कांग्रेस 100-120 सीटों तक पहुंचने में कामयाब रहती है, तो वो गैर-भाजपा गठबंधन को एक छत के नीचे लाने के विकल्पों पर विचार कर सकती है।
पार्टी सूत्र ने कहा, "अगर कांग्रेस को 140 सीट मिलती है, तो वो गठबंधन की अगुवाई के बारे में विचार कर सकती है। ऐसा 2004 में हुआ था। लेकिन कांग्रेस इस बार नेतृत्व को लेकर लचीला रुख अपनाएगी, क्योंकि उसके लिए मोदी के बजाय क्षेत्रीय दलों से हाथ मिलाना बेहतर रहेगा।"
वाम दलों को चारा डाला
प्रधानमंत्री पद के लिए उम्मीदवारी के बारे में पूछने पर कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने कहा था कि वो किसी पद की उम्मीद नहीं करते। जाहिर है, यह बयान उन्हें दौड़ से बाहर भी नहीं करता और नतीजे खराब आने पर दूसरों को मौका देने का विकल्प भी रखता है।
दिलचस्प है कि 6 अप्रैल को पहले दौर के मतदान से पहले रक्षा मंत्री ए के एंटनी ने कहा था कि वाम दलों को अपनी विचारधारा पर दोबारा विचार करना चाहिए और साथ ही मोदी को बाहर रखने के लिए यूपीए की तीसरी पारी में शामिल होना चाहिए।
एंटनी ने कहा था, "चुनावों के बाद कई राजनीतिक दल जो अभी कांग्रेस से हाथ मिलाने को तैयार नहीं, उन्हें भाजपा को सत्ता में आने से रोकने के लिए अपनी रणनीति पर दोबारा विचार करना होगा।"
'सेकुलर गठबंधन' का आइडिया कायम
हालांकि, कांग्रेस अभी तीसरे मोर्चे के समर्थन से इनकार कर रही है। लेकिन इस रणनीतिक इनकार को अलग रखें, तो भी मोदी को बाहर रखने के लिए 'सेकुलर गठबंधन' का आइडिया खत्म नहीं हुआ है। बल्कि इस विकल्प की तरफ एनडीए सरकार को रोकने के लिए सबसे बेहतर रास्ते के रूप में देखा जा रहा है।
कांग्रेस ने इसके लिए क्षेत्रीय दलों के सामने फेंकने वाला चारा भी चुन लिया है। वो क्षत्रपों को समझाने की कोशिश करेगी कि एनडीए के बजाय यूपीए में शामिल होना उनके लिए फायदेमंद रहेगा, क्योंकि मोदी उन्हें ज्यादा गुंजाइश नहीं देंगे, जबकि यूपीए में उन्हें अपनी बात रखने का मौका मिल सकता है।
कांग्रेस के रणनीतिकार दलील दे रहे हैं कि राहुल गांधी को पीएम के रूप में प्रोजेक्ट न कर समझदारी दिखाई गई है, क्योंकि भाजपा को मोदी को ओबीसी कार्ड खेलने के बाद दूसरा चेहरा तलाशने में आसानी नहीं होगी।
किसे मिलेगा जादुई नंबर?
हालांकि समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी, डीएमके और एआईडीएमके जैसे गैर-एनडीए दल एक साथ नहीं आ सकते, लेकिन कांग्रेसी नेताओं का मानना है कि गैर-एनडीए और गैर-यूपीए दलों की 200 सीटें इस गठबंधन का आधार बना सकती हैं।
कांग्रेस को इस वक्त जिस बात की चिंता सता रही है, वो यह कि क्या भाजपा वाकई जादुई नंबर तक पहुंच सकती है, जैसा कि चुनावी सर्वे दिखा रहे हैं। उसका मानना है कि इतनी सीटें लाना भगवा दल के लिए आसान नहीं होगा।
पार्टी का आकलन है कि अगर भाजपा को अपने दम पर 220 सीट और एनडीए को 250 सीटों तक पहुंचना है, तो इसके लिए सपा, बसपा, एआईडीएमके, बीजेडी और एनसीपी जैसे क्षत्रपों को बेहद बुरा प्रदर्शन करना होगा, जिसकी आशंका कम है।