चुनाव के मौके पर कांग्रेस और अन्य दलों में सेंध लगाने में जुटी भाजपा ने कांग्रेस की किसान नीति के प्रमुख सूत्रधार और कांग्रेस के कृषि थिंक टैंक माने जाने वाले डॉ. कृष्णवीर चौधरी को ही अपनी ओर कर लिया है।
चौधरी अब भाजपा की कृषि नीति बनाने में प्रमुख भूमिका निभाएंगे। इन्हें भाजपा में लाने का सियासी ऑपरेशन खुद पार्टी अध्यक्ष राजनाथ सिंह ने चलाया है।
अपना अब तक का राजनीतिक जीवन कांग्रेस में खपाने वाले चौधरी, लंबे समय तक वरिष्ठ कांग्रेस नेता और लोकसभा के पूर्व अध्यक्ष बलराम जाखड़ के खास सिपहसालार माने जाते थे।
सोनिया गांधी के वफादार बाशिंदे
लंबे समय तक वह किसान संगठन भारत कृषक समाज के कार्यकारी अध्यक्ष भी रहे लेकिन बाद में जाखड़ के साथ उनके मतभेद हो गए और उन्होंने भारतीय कृषक समाज के नाम से अलग किसान संगठन बना लिया लेकिन वे कांग्रेस में बने रहे।
मनमोहन सरकार की उदारवादी आर्थिक नीतियों के कटु आलोचक कृष्णवीर चौधरी को कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के प्रति बेहद वफादार माना जाता था। कृषि और किसानों से जुड़े मामलों पर सोनिया गांधी उनके सुझावों को तरजीह देती थीं।
सोनिया को लिखे चौधरी के पत्र का ही संज्ञान लेकर सोनिया ने सरकार के बीज विधेयक को संसद की स्थाई समिति के पास भिजवाया था। भूमि अधिग्रहण विधेयक से भी चौधरी ने सरकारी विधेयक में कई किसान विरोधी प्रावधानों को निकलवाने में अहम भूमिका निभाई थी।
इस तरह हुए भाजपा के
बीज विधेयक पर विचार विमर्श के दौरान ही वह भाजपा नेताओं के करीब आए थे।
कई सरकरी पदों पर रहे चौधरी कांग्रेस में किसानों की उपेक्षा और यूपीए सरकार के दौरान देश में हुई किसानों की आत्महत्याओं को लेकर बेहद मुखर थे, इसलिए कांग्रेस के कई बड़े नेता उनके खिलाफ हो गए थे।
भारतीय बीज बाजार और कृषि क्षेत्र पर अमेरिका और अन्य देशों की बहुराष्ट्रीय कंपनियों के कब्जे के खिलाफ चौधरी ने व्यापक जनमत बनाया जिसकी वजह से वह इन कंपनियों की आंखों की भी किरकिरी बन गए।
इसलिए भी केंद्र सरकार के कई मंत्री उनसे खफा थे। विश्व व्यापार संगठन की बैठकों में भारत में कृषि क्षेत्र की सब्सिडी घटाए जाने के विरोध में चौधरी ने कई देशों में जाकर भारत का पक्ष रखा।
एक तीर से दो निशाने
सोनिया के वफादार माने जाने वाले किसान नेता एवं कृषि मामलों के विशेषज्ञ डा.कृष्णवीर चौधरी को भाजपा में लाकर पार्टी अध्यक्ष राजनाथ सिंह ने एक तीर से दो निशाने साधे हैं।
एक तरफ तो इससे भाजपा को एक ऐसा नेता मिल गया है जो कांग्रेस और यूपीए सरकार को किसान की तबाही के लिए कठघरे में खड़ा कर सके।
वहीं, दूसरी तरफ पश्चिमी उत्तर प्रदेश में जाटों के बीच अपना नेतृत्व विकसित करने की भाजपा की मुहिम को भी धार मिलेगी।