कांग्रेस के कई नेता और कार्यकर्ता बीते कई दिनों से राहुल गांधी को प्रधानमंत्री के दावेदार के तौर पर पेश करने की मांग उठा रहे थे, हालांकि ऐसा हुआ नहीं। लेकिन यह साफ हो गया कि लोकसभा चुनावों में कमान उन्हीं के हाथ में रहेगी।
राहुल ने कहा था कि वह कांग्रेस को इस तरह तब्दील कर देंगे कि सभी हैरान रह जाएंगे। इन्हीं बदलावों में लोगों के बीच जाना और मीडिया का सामना करना शामिल था। दस साल में राहुल ने पहला टीवी इंटरव्यू दिया, तो खूब शोर-शराबा हुआ।
लेकिन जब से यह इंटरव्यू हुआ, कांग्रेस परेशान है। इस साक्षात्कार में राहुल ने गुजरात दंगों के लिए मोदी को जिम्मेदार ठहराया, लेकिन 84 में दिल्ली में हुए सिख विरोधी दंगों के लिए अपनी सरकार का बचाव किया। यह बयान आया और बवाल मच गया। विरोध-प्रदर्शन हुए। सिख संगठन राहुल से उन नेताओं के नामों का खुलासा करने के लिए कह रहे हैं, जिनकी भूमिका दंगों में रही।
कांग्रेस को धार खोने का डर
कांग्रेस को यह चिंता सताने लगी है कि राहुल गांधी ने सिख विरोधी दंगों का जिक्र कर चुनावों से ऐन पहले राजनीतिक समीकरण बदल दिए हैं। पार्टी का मानना है कि राहुल के बयान के बाद वह गुजरात दंगों को लेकर नरेंद्र मोदी पर जो करारा हमला बोल सकती थी, अब वो मुमकिन नहीं रहा है।
सिख संगठनों की ओर से तेज होते विरोध प्रदर्शन और समाचार बुलेटिन में 1984 के सिख विरोधी दंगों ने कांग्रेस को हमले की जद में लाकर खड़ा कर दिया। इन दंगों की आंच अब तक सज्जन कुमार और जगदीश टाइटलर जैसे कुछ नेताओं तक सीमित थी, लेकिन अब पार्टी दिक्कत में है।
साल 2009 में यह मामला गर्म हो गया था, जब कांग्रेस ने कुमार और टाइटलर को चुनावी टिकट देने का मन बनाया था, हालांकि जब यह मामला उछला, तो पार्टी को अपने कदम वापस खींचने पड़े।
मोदी उठा सकते हैं इस बयान का फायदा?
अगर सिख विरोधी दंगे आगे भी सुर्खियां बटोरते रहे, तो चुनावों से पहले कांग्रेस और भाजपा, दोनों पार्टियों को एक मंच पर खड़े दो दलों के रूप में पेश किया जा सकता है। खुद को धर्मनिरपेक्ष दल के रूप में सामने रखने वाली कांग्रेस के लिए यह मोदी पर हमला बोलने की कम होती संभावनाओं की तरह है।
कांग्रेस को इस बात की चिंता सता रहा है कि नरेंद्र मोदी चुनावी रैलियों और सार्वजनिक सभाओं में 1984 के सिख दंगों और इनमें कांग्रेसी नेताओं के शामिल होने का मामला उछाल सकते हैं। ऐसे में कांग्रेस के लिए इस मुद्दे से बचने की गुंजाइश कम बचेगी।
हर दिन बीतने के साथ कांग्रेस को अपना बचाव करने की जरूरत पड़ रही है और सत्तारूढ़ दल का मानना है कि सिख विरोधी दंगों का मामला सामने आने के बाद वह मोदी के खिलाफ आक्रामकता के साथ हमले नहीं कर पाएगा।
उदारवादी छवि सामने रखेंगे मोदी
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि राहुल गांधी का यह बयान नरेंद्र मोदी के लिए फायदे का सौदा साबित हो सकता है, जो इन दिनों गुजरात के दंगों को पीछे छोड़कर उदारवादी चोला ओढ़ने की कोशिश कर रहे हैं।
इसका असर चुनावों के बाद भी नजर आ सकता है, जब भाजपा को ऐसे सहयोगियों को तलाशना पड़ सकता है, जिनका आधार 'धर्मनिरपेक्ष' हो। शरद पवार की अगुवाई वाली राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (एनसीपी) का मोदी के पक्ष में बयानबाजी करना कांग्रेस की आंखें खोलने वाला घटनाक्रम है।
कांग्रेस इस बात से काफी निराश है कि 84 के सिख विरोधी दंगों पर पूछे गए सवाल को राहुल गांधी सही तरह से संभाल नहीं पाए। इस मामले में वह काफी आगे तक बोल गए, लेकिन मोदी को बचाव की मुद्रा में नहीं ला पाए और दिल्ली के दंगों का मामला एक बार बहस के लिए फिर खुल गया है।
राहुल की तैयारियों पर सवाल?
जानकारों का मानना है कि राहुल गांधी इस सवाल का बेहतर तरीके से सामना कर सकते थे। दस साल पहले इस मामले में कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी और प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने माफी मांगी थी और वह इसे आगे बढ़ा सकते थे।
ऐसा कहा जा रहा है कि जब वह इस मामले में घिर ही गए थे, तो उन्हें वरिष्ठ कांग्रेसी नेताओं की तर्ज पर माफी मांग लेनी चाहिए थी, जिसके बाद यह मामला लंबे वक्त के लिए खत्म हो जाता।
कांग्रेस में एक तबके का मानना है कि यह विवाद खड़ा होने के लिए राहुल जिम्मेदार हैं, लेकिन साथ ही उन्हें मुहैया कराई गई ब्रीफिंग का भी दोष है। उनका मानना है कि राहुल को इस मुद्दे पर बैकग्राउंड ब्रीफिंग सही ढंग से मुहैया नहीं कराई गई, जिससे यह नुकसान हुआ।
आगे सुधार करेंगे कांग्रेस उपाध्यक्ष
अब इस बात की उम्मीद की जा रही है कि राहुल आगामी टीवी इंटरव्यू में इस गलती को सुधारने की कोशिश करेंगे। हालांकि, पार्टी के नेता इस बात से खुश हैं कि राहुल गांधी ने आखिरकार बातचीत करने और अपनी राय सामने रखना शुरू कर दिया है।
कांग्रेस का मानना है कि इस इंटरव्यू से यह संकेत मिले हैं कि राहुल गांधी मीडिया से बातचीत करने में घबराते नहीं हैं। हालांकि, अगली बार मीडिया का सामना करते वक्त उन्हें ज्यादा सावधानी बरतनी होगी, क्योंकि अपने तरकश की कमियों को वह पहले ही उजागर कर चुके हैं।
निराशा के बावजूद कांग्रेस में भीतर इस बात की खुशी है कि राहुल गांधी ने बातचीत के दौरान अपना संयम नहीं खोया और मोदी से उलट बातचीत पूरी की। एक टीवी इंटरव्यू के दौरान मोदी बीच से उठकर चले गए थे, जिसे लेकर उनकी काफी आलोचना हुई।