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बस्तर में हारे रमन आखिर जीते कैसे?

Sun, 08 Dec 2013 07:29 PM IST
सुदीप ठाकुर/अमर उजाला दिल्ली
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ऐसा कहा जाता है कि जो बस्तर में हारता है वह चुनाव हारता है। रमन सिंह ने इस मिथम को झुठला दिया है।
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छत्तीसगढ़ के बारे में अक्सर कहा जाता रहा है कि वहां सत्ता की चाबी बस्तर के पास है, मगर विधानसभा के नतीजों ने इस मिथक को तोड़ दिया है। इस नक्सल प्रभावित आदिवासी क्षेत्र में सीटें गंवाने के बावजूद भाजपा छत्तीसगढ़ में डॉ रमन सिंह की अगुआई में लगातार तीसरी बार सरकार बनाने जा रही है। पिछली बार भाजपा को बस्तर की 12 में से 11 सीटें मिली थीं। इस बार उसे यहां सिर्फ चार सीटें ही मिली हैं।

बस्तर और राजनांदगांव में कमजोर प्रदर्शन

छत्तीसगढ़ के लोगों ने 'चाऊर वाले बाबा' रमन सिंह पर एक बार फिर से भरोसा जताया है, लेकिन गृहमंत्री ननकीराम कंवर सहित पांच मंत्रियों को मिली हार बताती है कि उन्हें इस बार अपना मंत्रिमंडल बनाते समय काफी सावधानी रखनी होगी। मुख्यमंत्री रमन सिंह राजनांदगांव से 35 हजार सीटों से भी अधिक मतों से जीतने में जरूर सफल हुए, लेकिन भाजपा को जिले की छह में से सिर्फ दो ही सीटें मिली हैं।
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पिछली बार इस जिले में भाजपा के पास चार सीटें थीं। वास्तव में बस्तर और राजनांदगांव की कुल 18 सीटों पर पहले दौर में 11 नवंबर को चुनाव हुए थे, जहां पिछली बार भाजपा के पास कुल 15 सीटें थीं, लेकिन इस बार उसे यहां सिर्फ छह सीटें ही मिलीं। इसका मतलब साफ है कि पहले दौर की खाई को भाजपा ने दूसरे दौर की 72 सीटों पर हुए चुनावों में पाट दिया। इसका दूसरा अर्थ यह है कि कांग्रेस पहले दौर में मिली बढ़त का फायदा नहीं उठा सकी।

मोदी की रैलियों का बड़ा फायदा

दूसरे दौर के अंतिम पांच दिनों के दौरान छत्तीसगढ़ में नरेंद्र मोदी की आधा दर्जन से अधिक सभाएं कराई गई थीं, इसका फायदा निश्चित ही भाजपा को मिला होगा, लेकिन यह हैट्रिक रमन सिंह की लोकप्रियता का प्रमाण है इसमें संदेह नहीं होना चाहिए।

असल में उन्होंने अपने दूसरे कार्यकाल में जिस तरह से लड़कियों के लिए साइकिलें, महिलाओं के लिए सिलाई मशीन, बुजुर्गों को तीर्थयात्रा, बड़े पैमाने पर शिक्षा कर्मियों की भर्तियों से लेकर कुम्हारों और हजामत बनाने वालों तक के लिए विभिन्न योजनाएं शुरू कर उनसे सीधे जुड़ने की कोशिश की थी।

मुद्दा नहीं बन पाया माओवादी हमला

दंतेवाड़ा सीट से झीरमघाटी के हमले में कांग्रेस के काफिले में मारे गए दिग्गज नेता महेंद्र कर्मा की पत्नी देवती और खरसिया से इसी हमले में मारे गए पूर्व कांग्रेस अध्यक्ष नंदकुमार पटेल के बेटे उमेश चुनाव जरूर जीत गए, लेकिन कांग्रेस माओवादी हिंसा के खिलाफ भाजपा सरकार की नाकामी को मुद्दा बनाने में नाकाम रही।

असल में गुटबाजी में बंटी कांग्रेस के लिए ये विधानसभा चुनाव भी सबक की तरह हैं। हालत यह थी कि चुनाव के दौरान भी प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष चरणदास महंत और प्रचार समिति के संयोजक अजीत जोगी एक दूसरे से सामंजस्य नहीं बना सके। यही नहीं, कुछ महीने पहले जब रमन सिंह के खिलाफ कांग्रेस के वरिष्ठ नेता भूपेश बघेल ने भ्रष्टाचार का मुद्दा उठाया तो उन्हें भी पार्टी का पूरा समर्थन नहीं मिला।
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धान का कटोरा कहे जाने वाले छत्तीसगढ़ में हमेशा चावल और धान का मुद्दा अहम होता है। इस बार भी था, जिस पर खासी सियासत हुई। पिछली बार दो रुपये किलो वाले चावल ने रमन सिंह को सत्ता दिलाई थी। इस बार उन्होंने एक रुपये किलो चावल की पेशकश की। जवाब में कांग्रेस ने आयकर दाताओं को छोड़ बाकी लोगों को मुफ्त में चावल की पेशकश की, मगर लोगों ने उस पर भरोसा नहीं जताया।
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