झारखंड में वैकल्पिक सरकार को लेकर कांग्रेस और झारखंड मुक्ति मोर्चा (झामुमो) के बीच सियासी नापतोल की प्रक्रिया जारी है। इसके चलते राष्ट्रपति शासन लागू करने की प्रक्रिया को कुछ मंद कर दिया गया है, हालांकि इसकी आशंका बनी हुई है।
केंद्रीय गृह मंत्री सुशील कुमार शिंदे ने कहा है कि झारखंड के राज्यपाल ने अभी शुरुआती रिपोर्ट दी है। संवैधानिक विकल्पों को तलाशने के बाद ही राज्यपाल आगे फैसला करेंगे। वहीं कांग्रेस और झामुमो की बातचीत में अभी कई पेंच फंसे हुए हैं। जिसे देखते हुए कांग्रेस जल्द ही कोई फैसला लेने के हक में नहीं है।
बृहस्पतिवार को दिल्ली में झारखंड की सियासत गरम रही। झामुमो नेताओं और कांग्रेस के शीर्ष नेताओं के बीच बातचीत का दौर लगातार जारी रहा। झामुमो सुप्रीमो शिबू सोरेन के बेटे हेमंत ने कांग्रेस प्रभारी शकील अहमद से मुलाकात की।
सूत्रों के मुताबिक कांग्रेस अभी कुछ पशोपेश में है और फिलहाल किसी जल्दबाजी के मूड में भी नहीं है। वह झामुमो को आगामी 2014 के लोकसभा चुनाव में अपना सहयोगी बनाकर चलना चाहती है। मगर साथ ही विरोधियों को अंगुली उठाने का मौका भी पार्टी नहीं देना चाहती। इसलिए पार्टी हाईकमान पूरी सतर्कता बरत रहा है।
सूत्रों के मुताबिक कांग्रेस ने जेएमएम के सामने तीन बातें रखी हैं। कांग्रेस के शीर्ष नेताओं ने हेमंत से कहा है कि वह सबसे पहले अपने पिता के साथ एक राय बना लें कि सरकार बनने की स्थिति में उन दोनों में से कौन मुख्यमंत्री होगा।
दूसरा, सरकार बनने से पहले एक न्यूनतम साझा कार्यक्रम बनाने के लिए कहा गया है। साथ ही मंत्रिमंडल में मंत्री कौन होंगे और उनके रिकॉर्ड के बारे में पूछा गया है। साथ ही कांग्रेस ने झामुमो को कानूनी पेंच के बारे में भी चेता दिया है कि अभी राज्यपाल की अंतिम रिपोर्ट नहीं आई है।
अभी राज्यपाल ने अपनी प्रारंभिक रिपोर्ट में प्रदेश के राजनीतिक हालात बताए हैं कि 39 विधायक विधानसभा भंग करने के पक्ष में हैं तो 42 खिलाफ हैं। कांग्रेस नेताओं का तर्क है कि ऐसे में अंतिम रिपोर्ट आने से पहले ही वैकल्पिक सरकार बनाने का फैसला कानूनी रूप से ठीक नहीं होगा। कोई इसे कोर्ट में चुनौती देता है तो यह मामला हल्का साबित हो सकता है।