भारत में बड़ी संख्या में मुसलमान युवा जेलों में बंद हैं। इनमें से बहुत से युवाओं को न्याय मिलने में सालों-साल लग जाते हैं। उन्हें भले ही आखिरकार बेगुनाह करार दे दिया जाए, लेकिन उनके जीवन के अहम साल जेल में खत्म हो जाते हैं।
किसी का करियर डूब जाता है, तो किसी का परिवार बिखर जाता है। सालों बाद जब वे अपने घर वापस आते हैं तब तक जिंदगी पूरी तरह पटरी से उतर चुकी होती है। पुरानी दिल्ली के मोहम्मद आमिर खान पायलट बनकर अपने करियर में ऊंची उड़ान भरना चाहते थे। मगर उनके सपनों की उड़ान वक्त से पहले जमीन पर आ गई। 14 सालों तक जेल में रहने के बाद अब आमिर टूट चुके हैं।
आमिर उस शाम को आज भी नहीं भूले हैं, जब वो अपनी मां के लिए दवा लेने घर से निकले थे। उनका कहना है कि उसी दौरान पुलिस ने उन्हें रास्ते से ही पकड़ लिया था। आमिर तब 18 साल के थे। बाद में उन पर बम धमाके करने, आतंकी साजिश रचने और देश के खिलाफ युद्ध करने जैसे संगीन आरोप लगाए गए।
18 की उम्र में 19 मामलों में उलझे
18 साल की उम्र में आमिर 19 मामलों में उलझ गए थे। उनके सामने थी एक लंबी कानूनी लड़ाई। 1998 में शुरू हुई उनकी कानूनी जंग 2012 तक चली और आखिरकार फरवरी 2012 में अदालत ने उन्हें बेगुनाह करार दिया। वे सभी मामलों में बरी कर दिए गए।
जेल में आमिर के 14 साल ही नहीं बीते, बल्कि उनके सारे सपने भी चकनाचूर हो गए। जब वो जेल से निकले तो उनके पिता का निधन हो चुका था। सदमे में डूबी उनकी मां अब कुछ बोल नहीं पाती हैं। उनकी आवाज हमेशा के लिए चली गई है। मगर इतना सबकुछ हो जाने के बाद भी देश की न्याय व्यवस्था से उनका भरोसा नहीं टूटा है।
आमिर का कहना है निर्दोष करार दिए जाने के बाद जेल में कटे उनके जीवन के अनमोल सालों की भरपाई आखिर कौन करेगा। वो अपनी जिंदगी को नए सिरे से शुरू करने की कोशिश कर रहे हैं, मगर सवाल है उनके पुनर्वास की जिम्मेदारी कौन लेगा? आमिर के मुताबिक वे तमाम नेताओं के साथ-साथ राष्ट्रपति से भी मिल चुके है, मगर किसी से उन्हें आश्वासनों के अलावा कुछ नहीं मिला।
जेल में बेगुनाह अल्पसंख्यक भी कैद
आमिर जैसे कई और नौजवान हैं, जिन्हें कई सालों तक जेल में रहने के बाद अदालत ने बेगुनाह पाया। नेशनल क्राइम रिकार्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) के आंकड़ों के मुताबिक भारत के कुल कैदियों में 28.5 फीसदी कैदी विभिन्न अल्पसंख्यक समुदायों से संबंध रखते हैं। जबकि देश की आबादी में इनकी हिस्सेदारी मात्र 20 फीसदी है।
जेलों में बंद धार्मिक अल्पसंख्यकों की बात की जाए तो दिसंबर 2013 तक 19.7 फीसदी मुसलमान जेलों में बंद हैं। सिख समुदाय के 4.5 फीसदी लोग जेलों में बंद हैं, ईसाई समुदाय के 4.3 फीसदी लोग जेलों में बंद हैं।
आंकड़े यह भी बताते हैं कि 5.4 फीसदी मुसलमान, 1.6 फीसदी सिख और 1.2 फीसदी ईसाई कैदियों पर ही आरोप तय हो पाया है। वहीं 14 फ़ीसदी मुसलमान, 2.8 फ़ीसदी सिख और 3 फीसदी ईसाई कैदी फिलहाल अंडरट्रायल हैं।
एक दर्जन नौजवान जेल में बंद
बेगुनाहों की रिहाई के लिए बने संगठन रिहाई मंच के संस्थापक व लखनऊ में रहने वाले एडवोकेट शोएब इस समय उत्तर प्रदेश की अदालतों में उन छह मामलों को देख रहे हैं, जिनमें करीब एक दर्जन नौजवान जेलों में बंद हैं। ये सारे मामले आंतकवाद से जुड़े हुए हैं। वो बताते हैं कि जिन मामलों को वो देख रहे थे उनमें से दो मामलों में चार नौजवान बाइज्जत रिहा हो गए हैं। लेकिन उनकी जिंदगी के अहम सात साल जेल में ही निकल गए।
शोएब बताते हैं कि चर्चित और विवादित खालिद मुजाहिद और हकीम तारिक का भी केस वही देख रहे हैं। इस मामले में उत्तर प्रदेश सरकार ने निमेष आयोग का गठन किया। आयोग ने इस मामले में गिरफ्तार दोनों मुस्लिम नौजवानों को निर्दोष बताया। खालिद मुजाहिद की पुलिस ट्रायल के दौरान मौत हो गई। मौत की वजह साफ नहीं है, लेकिन हकीम तारिक एक दूसरे मामले में जेल में बंद है।
23 नवंबर, 2007 में उत्तर प्रदेश के तीन शहरों लखनऊ, फैजाबाद और वाराणसी में एक ही दिन 25 मिनट के भीतर सिलसिलेवार धमाके हुए थे, जिनमें 18 लोग मारे गए। इन्हीं धमाकों में खालिद मुजाहिद और हकीम तारिक को गिरफ्तार किया गया था। इन्हें पुलिस रिकार्ड में 22 दिसंबर को उत्तर प्रदेश के बाराबंकी जिले से गिरफ्तार दिखाया गया। हालांकि, इनके परिवार वालों का दावा है कि इन्हें 12 दिसंबर को उठाया गया था।
'करप्ट एवं सांप्रदायिक है प्रशासन'
मायावती सरकार ने 14 मार्च 2008 को खालिद मुजाहिद और हकीम तारिक़ के 'आतंकवादी गतिविधियों' में शामिल होने की जांच के लिए आयोग का गठन किया था। आयोग ने अपनी रिपोर्ट 31 अगस्त 2012 को पेश की। सितंबर महीने में आयोग की रिपोर्ट को अखिलेश सरकार ने विधानसभा की पटल पर स्वीकार किया।
मानवाधिकार कार्यकर्ता और हाल में आई पुस्तक ‘काफ्का लैंड’ की लेखिका मनीषा सेठी कहती हैं, “देश का क्रिमिनल जस्टिस सिस्टम ही गरीबों व अल्पसंख्यकों के ख़िलाफ है। पुलिस व जांच एजेंसियां निष्पक्ष नहीं हैं। आप देखेंगे कि मुसलमान 20-20 साल जेलों में रह रहे हैं और उसके बाद अदालत उन्हें निर्दोष बताती है। हम सबको इस पर जरूर सोचना चाहिए।”
एसोसिएशन फॉर प्रोटेक्शन ऑफ सिविल राइट्स से जुड़े अखलाक़ अहमद का आरोप है कि प्रशासन करप्ट होने के साथ-साथ सांप्रदायिक भी है। अखलाक अहमद साल 2012 में सुप्रीम कोर्ट के एक खास केस का जिक्र करते हैं। इसमें सुप्रीम कोर्ट में जस्टिस एचएल दत्तू और जस्टिस सीके प्रसाद की दो सदस्यीय बेंच ने गुजरात के शहर अहमदाबाद में साल 1994 के आतंकवादी कार्रवाई के एक केस में 11 अभियुक्तों को ये कहते हुए बरी कर दिया कि कानून इस बात की इजाजत नहीं देता कि किसी शख्स को उसके धर्म के आधार पर सताया जाए।
मुस्लिम कैदियों की स्थिति ठीक नहीं
एनसीआरबी के मुताबिक साल 2013 के अंत तक करीब 20 हजार मुसलमान उत्तर प्रदेश के विभिन्न जेलों में बंद थे। वहीं पश्चिम बंगाल में करीब 10 हजार मुसलमान जेलों में थे।
(पुलिस मुठभेड़ पर सुप्रीम कोर्ट के दिशा निर्देश)
डिटेंशन (हिरासत) के मामले में गुजरात सबसे आगे है, उसके बाद तमिलनाडु का नंबर है। एनसीआरबी के आंकड़े बताते हैं कि जेल की कुल आबादी का 65 फीसदी कैदी एसटी(अनुसूचित जनजाति), एससी(अनुसूचित जाति) व ओबीसी(अन्य पिछड़ा वर्ग) हैं। इनमें एससी 21.7 फीसदी, एसटी 11.5 फीसदी और ओबीसी 31.6 फीसदी हैं।
मानवाधिकार कार्यकर्ता हिमांशु कुमार बताते हैं, "ये जातियां हिन्दुस्तान में पिछड़ी व गरीब हैं। इनके साथ सरकारें सामाजिक व आर्थिक न्याय नहीं कर रही हैं। ये ही सबसे अधिक अन्याय के शिकार हैं। जो अपने हक़ की लड़ाई लड़ रहे हैं, वही जेलों में हैं।"
अन्य देशों में भी यही हाल
हिमांशु कुमार के मुताबिक ऐसा सिर्फ भारत में ही नहीं है, बल्कि विश्व के अन्य देशों में भी यही हाल है। अमरीका के जेलों में ज्यादातर काले और मजदूर ही बंद हैं। पिछले दिनों बाजार में आई 'कलर्स ऑफ केज' के लेखक अरुण फरेरा का कहना है, "जो शोषित तबका है, पुलिस उसी का शोषण करती है और जो बड़ा है, वो जेल के भीतर भी बड़ा है।"
फरेरा मानते हैं कि समाजशास्त्रीय तरीके से देखा जाए तो अपराध करने, कराने के पीछे इनकी आर्थिक विपन्नता भी एक कारण हो सकती है। तिहाड़ जेल के वेलफेयर ऑफिसर चरण सिंह जेल में बढ़ती आबादी, खासकर दलितों व मुस्लिमों की आबादी, के पीछे कई सारे कारण गिनाते हैं। चरण सिंह बताते हैं, "अशिक्षा, गरीबी,बेरोज़गारी, बड़े परिवार, लोगों में कई तरह के अंधविश्वास, लोगों की संगत, समाज में असमानता, एक दूसरे से आगे बढ़ने की होड़ इत्यादि अहम कारण हैं। कानून को लागू करने में भेदभाव भी इसकी बड़ी वजह है।"