पश्चिमी उत्तर प्रदेश में अब सांप्रदायिक चेतना वहां के रोजमर्रा के जीवन में फैलने लगी है। यह ऊपर से सिर्फ राजनीति का खेल लगता है लेकिन इसके कई गहरे कारण हैं। अगर हम हिंदू और मुस्लिम समुदायों के आपसी संबंधों के राजनीतिक अर्थशास्त्र की व्याख्या करें तो हमें इसके कारण समझ में आएंगे।
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पहले सांप्रदायिक दंगे होते थे, जो लंबी तैयारी कर सांप्रदायिक शक्तियां आयोजित करती थीं। फिर साल 2012 के बाद उत्तर प्रदेश में, खासकर पश्चिमी उत्तर प्रदेश में, छोटे-छोटे सांप्रदायिक दंगों की घटनाएं आए दिन होने लगीं। समाज में दो संप्रदायों के रोज के जीवन के छोटे-छोटे विवाद सांप्रदायिक रंग लेने लगे।
अब सांप्रदायिक चेतना हमारे समाज में आधारतल तक पहुंच कर परिवारों में, हमारे घरों में, हमारे आस-पड़ोस में फैलती हुई व्यक्तिगत विवादों को सांप्रदायिक रंग देने लगी है। पश्चिमी उत्तर प्रदेश में जाट बिरादरी एक प्रभावी और प्रबल सामाजिक समुदाय है। यहां हिंदुओं में 'जाट' एवं मुस्लिमों में 'मुल्ला जाट' अग्र समुदाय हैं।
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बिगड़ते गए हालात
मुसलमानों में यूं अंसारी, कसाई, ताती, चिकवा, अनेक समूह हैं पर 'मुल्ला जाट' मुसलमानों का अशराफ (अभिजात्य समूह) है। राजवीर पश्चिमी उत्तर प्रदेश के एक गांव में जाट बिरादरी से जुड़े हैं। वो बताते हैं कि औरंगजेब के समय में जाटों में से ही जो धर्म परिवर्तन कर मुसलमान हो गए, वे 'मुल्ला जाट' हो गए। ये मुख्यत: बड़े भू-भागों के स्वामी हैं और स्वयं की भूमि पर खेती करके अपना जीवन निर्वाह करते हैं।
आज वो पशुपालन और मुर्गीपालन भी करते हैं। आजादी के बाद जब भारत-पाक विभाजन हुआ तब सांप्रदायिक दंगे हुए, तब हमारे संबंधों को चोट पहुंची। 1960 के दशक के बाद संबंध कुछ ठीक होने शुरू हुए लेकिन जब 1990 के दशक में बाबरी मस्जिद विध्वंस हुआ तो संबंध और खराब हो गए। चौधरी चरण सिंह ने 1970 के दशक में आर्थिक रूप से सशक्त मुल्ला जाट एवं हिन्दू जाट समुदायों का 'मजगर' नाम से एक सामाजिक गठबंधन बनाया था।
इस आर्थिक रूप से सशक्त सामाजिक समुदाय ने राजनीतिक परिवेश में भी बढ़त हासिल की। लेकिन आरक्षण नीति के आने के बाद इस सामाजिक गठबंधन में दरार आई जिसने सामुदायिक हिंसा का रूप ले लिया। भारत-पाक विभाजन के समय देश के कई हिस्सों में और उत्तर प्रदेश में भी हुए सांप्रदायिक दंगों ने हमारे समाज में कुछ नासूर पैदा किए जिससे जाट एवं मुल्ला जाट का भाईचारा टूटा।
हिन्दुत्ववादी शक्तियां
बुजुर्ग बताते हैं कि दस-बीस साल बाद फिर हमारे संबंध बेहतर होने लगे। इसी बीच पश्चिमी उत्तर प्रदेश हिंदुत्ववादी शक्तियां वीएचपी, आरएसएस और अनेक समूहों की तीव्र गतिविधियों का केन्द्र बन गया। इनकी गतिविधियों ने दोनों समुदायों के बीच दरारें और बढ़ा दीं। भारत-पाक विभाजन होने के बाद से ही हिन्दुत्ववादी शक्तियां सक्रिय हो गई थीं और वो धीरे-धीरे काम करती रहीं लेकिन कारगर सिद्ध नही हुईं।
जब 60-70 के दशक में संबंध ठीक हुए तब भी उनके सामाजिक संबंधों पर गहरा असर नहीं दिखा। 1980 के दशक में इनका प्रभाव बढ़ने लगा और जमीनी स्तर पर इनके संगठन सक्रिय हो गए। 1990 के दशक में बाबरी मस्जिद के विवाद के दौरान इन संगठनों का पूरा असर दिखाई देने लगा।
यह संगठन जिला केन्द्रों, छोटे-छोटे शहरों, कस्बों और अब गांवों तक फैल गए हैं। सार्वजनिक जगहें जैसे गांवों के मंदिर, चौराहे, पान की गुमटियों, ढाबा आदि अब उनकी गतिविधियां के जद में आने लगे हैं। अनेक छोटे-छोटे सामाजिक संगठन बना कर 'लव जिहाद', 'बेटी की इज्जत' को मुद्दा बना दोनों समूह में दूरी बढ़ाई गई हैं।
शोधों के अनुसार वर्ष 2005 के आसपास उनकी गतिविधियां दिखाई देने लगी थीं पर इसका परिणाम बाद में नजर आया। जाट एवं मुल्ला जाट दोनों भाई तो थे, पर जाटों में यह बात फैलाई गई कि धर्म परिवर्तन करने से वे 'निम्न' हो गए हैं और अन्य मुसलमान हिन्दू समाज विशेषकर जाट समाज की पवित्रता को भंग करना चाहते हैं।
हिन्दुत्ववादी शक्तियों और जाट अभिजात्य वर्ग के मिले-जुले ब्योरे के माध्यम से यह बात पता लगती है। दोनो के संबंधों में जो टकराव शुरू हुआ है, वो पश्चिमी उत्तर प्रदेश को एक सांप्रदायिक जोन में बदलता जाएगा। इसका असर वर्ष 2017 में होने वाले विधान सभा चुनाव में भी दिखाई देगा और सांप्रदायिक गोलबन्दी बड़े पैमाने पर होगी।