कैबिनेट ने राजनीतिक तौर पर अति संवेदनशील माने जाने वाले सांप्रदायिक हिंसा बिल के ताजा मसौदे को हरी झंडी दे दी है। संसद में पास होने की नगन्य संभावना के बावजूद सरकार इस बिल को मंगलवार को पेश कर सकती है।
सरकार बिल के उस प्रावधान को खास तवज्जो दे रही है, जिसके तहत सांप्रदायिक हिंसा के 20 साल बाद तक प्रताड़ित पक्ष पुलिस में शिकायत कर सकते हैं।
गौरतलब है कि मुख्य विपक्षी पार्टी भाजपा ने इस बिल को आजाद भारत का सबसे खतरनाक कानूनी मसौदा करार देते हुए इसके विरोध का ऐलान कर दिया है।
माना जा रहा है कि सरकार 2014 के लोकसभा चुनाव के मद्देनजर अल्पसंख्यक समुदायों के बीच संदेश देने के लिए यह बिल पेश करना चाहती है।
हालांकि भाजपा सहित कई राज्यों के विरोध को देखते हुए सरकार ने इसके मूल मसौदे में कई बदलाव किए हैं। इसके मसौदे से अल्पसंख्यक शब्द हटाकर क्षेत्र और भाषा के नाम पर होने वाली हिंसा को भी सांप्रदायिक हिंसा की श्रेणी में लाने का फैसला किया गया है। इसके अलावा राज्यों में इस कानून को लागू करने के लिए जिले के डीएम और एसपी को अधिकार दिए हैं।
बिल के मुताबिक जब तक डीएम और एसपी हिंसा वाले इलाके को अशांत इलाका घोषित नहीं करेंगे तब तक यह कानून लागू नहीं होगा। सरकार को उम्मीद है कि इन फेरबदल के बाद विपक्ष और राज्यों को इसे स्वीकारने में कोई दिक्कत नहीं आनी चाहिए।
कैबिनेट की बैठक में बिल के मसौदे को मंजूरी दिए जाने की जानकारी देते हुए गृह मंत्री सुशील कुमार शिंदे ने कहा कि हम इसे मंगलवार को संसद में पेश करने की कोशिश करेंगे।
सूत्रों के मुताबिक नए मसौदे में हिंसा पीड़ितों को जो मुआवजा दिया जाएगा, केंद्र सरकार उस राशि को राज्यों को केंद्रीय टैक्स के तहत दिए जाने वाले पैसे में से काट देगा। केंद्र सरकार केंद्रीय टैक्स से एकत्रित राशि में से बड़ा हिस्सा राज्यों को देता है।
सरकारी सूत्रों के मुताबिक इस बिल के पास होने के बाद केंद्र मुआवजे में जितनी रकम खर्च करेगा उसे अगले साल के टैक्स की रकम से काट लिया जाएगा। सरकार के मुताबिक ऐसा राज्यों को हिंसा की रोकथाम के प्रति जिम्मेदार बनाने के मकसद से किया जा रहा है।