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आम आदमी को नहीं सस्ते इलाज का 'हक'!

Sun, 23 Nov 2014 12:26 PM IST
अमर उजाला नेटवर्क/नई दिल्ली, लखनऊ, चंडीग, शिमला
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...तो क्या हमें मान लेना चाहिए कि आम आदमी को सस्ते इलाज का कोई ‘हक’ नहीं है? अगर उसे स्वस्थ रहना है, तो इलाज के लिए दवाइयों पर मोटी रकम खर्च करनी होगी। डॉक्टर, दवा कंपनियां और मेडिकल स्टोर मालिक, सबकी मिलीभगत के चलते सस्ती दवाएं मरीजों की पहुंच से बाहर हो चली हैं।
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गुणवत्ता के नाम पर सस्ती जेनेरिक दवाओं को खारिज किया जा रहा है। उसके बदले महंगी ब्रांडेड दवाओं को तवज्जो दी जा रही है, जबकि सच्चाई यह है कि दोनों ही दवाएं एक ही फॉर्मूले पर आधारित हैं।

माना जाता है कि दवा बनाने वाली कंपनियां डॉक्टरों, मेडिकल स्टोर मालिकों और मेडिकल क्षेत्र से जुड़े लोगों को खुश रखने की पूरी कोशिश करती हैं। इनके लिए कांफ्रेंस, टूर पैकेज, मुफ्त सुविधाएं आदि दवा बनाने वाली कंपनियों द्वारा मुहैया कराई जाती है। इसी वजह से जब ब्रांडेड कंपनी बाजार में आती है, तो उसमें उसके मार्केटिंग खर्च और मेडिकल स्टोरों को दिए जाने वाले मुनाफे आदि को जोड़ा जाता है। लिहाजा दवा कीमतें बढ़ जाती हैं।
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जेनेरिक व ब्रांडेड दवाओं में अंतर कैसा?

इंडियन मेडिकल एसोसिएशन के महासचिव डॉ. नरेंद्र सैनी का कहना है कि देश में दवाओं की गुणवत्ता और मात्रा पर नियंत्रण के लिए भी देश में कोई नियम-कानून नहीं हैं। इस कारण डॉक्टरों को गुणवत्ता के लिए ब्रांडेड दवाएं लिखनी पड़ती हैं। लेकिन लखनऊ स्थित केंद्रीय औषधि अनुसंधान संस्थान के वरिष्ठ वैज्ञानिक विनय त्रिपाठी के मुताबिक दवाओं के जेनेरिक होने का मतलब कोई नया फॉर्मूला नहीं होता, जो गुणवत्ता प्रभावित हो। हरियाणा के सहायक राज्य औषधि नियंत्रक नरेंद्र आहूजा ने भी पुष्टि की कि जेनेरिक व ब्रांडेड दवाएं एक ही फैक्ट्री और एक ही मशीन पर बनती हैं, फिर गुणवत्ता में अंतर कैसे हो सकता है?

क्या है जेनेरिक दवा
दरअसल 20 साल के बाद किसी भी दवा के पेटेंट की समय सीमा खत्म हो जाती है। इसके बाद कोई भी कंपनी दवा के निश्चित फॉर्मूले का इस्तेमाल कर जेनेरिक के रूप में इस दवा को बना सकती है।

ड्रग्स प्राइज कंट्रोल की लचर नीति
आईएमए से जुड़े डाक्टर मानते हैं कि राष्ट्रीय औषधि मूल्य निर्धारण प्राधिकरण की ड्रग्स प्राइज कंट्रोल आर्डर (डीपीसीओ) की नीतियां लचर हैं। यदि अथॉरिटी सभी प्रमुख दवाओं को डीपीसीओ कंट्रोल के अंदर ले ले तो जेनरिक दवाओं की जरूरत ही नहीं पड़ेगी।
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