...तो क्या हमें मान लेना चाहिए कि आम आदमी को सस्ते इलाज का कोई ‘हक’ नहीं है? अगर उसे स्वस्थ रहना है, तो इलाज के लिए दवाइयों पर मोटी रकम खर्च करनी होगी। डॉक्टर, दवा कंपनियां और मेडिकल स्टोर मालिक, सबकी मिलीभगत के चलते सस्ती दवाएं मरीजों की पहुंच से बाहर हो चली हैं।
गुणवत्ता के नाम पर सस्ती जेनेरिक दवाओं को खारिज किया जा रहा है। उसके बदले महंगी ब्रांडेड दवाओं को तवज्जो दी जा रही है, जबकि सच्चाई यह है कि दोनों ही दवाएं एक ही फॉर्मूले पर आधारित हैं।
माना जाता है कि दवा बनाने वाली कंपनियां डॉक्टरों, मेडिकल स्टोर मालिकों और मेडिकल क्षेत्र से जुड़े लोगों को खुश रखने की पूरी कोशिश करती हैं। इनके लिए कांफ्रेंस, टूर पैकेज, मुफ्त सुविधाएं आदि दवा बनाने वाली कंपनियों द्वारा मुहैया कराई जाती है। इसी वजह से जब ब्रांडेड कंपनी बाजार में आती है, तो उसमें उसके मार्केटिंग खर्च और मेडिकल स्टोरों को दिए जाने वाले मुनाफे आदि को जोड़ा जाता है। लिहाजा दवा कीमतें बढ़ जाती हैं।