सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश टीएस ठाकुर ने जैसे ही 2013 में आए फैसले पर पुनर्विचार करने का फैसला सुनाया वैसे ही कोर्ट के बाहर खड़े समलैंगिकों से चेहरे पर मुस्कान खिल उठी। वे एक दूसरे को गले लगाने लगे और चूमने लगे। लेकिन वहीं दूसरी ओर वे लोग निराश हो गए जो नहीं चाहते कि देश में समलैंगिकता को वैध करार दिया जाए।
समलैंगिकता को लेकर देश के लगभग सभी धर्मों में एक जैसी ही मान्यताएं हैं। भारतीय समाज के लगभग सभी धर्मों का मानना है कि समलैंगिकता का हमारी संस्कृति में कोई स्थान नहीं है। इसमें हिन्दू, मुस्लिम और ईसाई धर्म के लोग शामिल हैं। उन लोगों का कहना है कि 2009 में समलैंगिकता को लेकर आए दिल्ली हाईकोर्ट का फैसला 'अंतरराष्ट्रीय चलन और पश्चिमी सभ्यता' को पोषक था।
उन लोगों को का कहना है कि भारत और दुनिया की अन्य सभ्यताओं में जमीन आसमान का अंतर है। अपोस्टोलिक चर्च अलायंस के की ओर से वकील मनोज वी जॉर्ज ने कहा, 'बाइबिल में समलैंगिकता को वर्जित बताया गया है। ईसाई मान्यताओं के तहत इस पाप माना गया है।'