पीएम मोदी के दौरे के हफ्ते भर बाद ही चीन ने एक बार फिर अपना असली रंग दिखा दिया है। उसने भारत-चीन के बीच मैकमोहन रेखा पर अपने पुराने रुख पर कायम रहते हुए उसे अवैध करार दिया है।
हालांकि, उसने यह भी कहा है कि वह भारत के साथ दोस्ताना माहौल में सीमा विवाद के मुद्दों का जल्द से जल्द हल निकालना चाहता है। जिससे द्विपक्षीय रिश्तों के लिए और ज्यादा अनुकूल माहौल बनाया जा सके। माना जा रहा है कि चीन का यह रुख उसके अरुणाचल प्रदेश पर दावे की एक बार फिर से पुष्टि करता है, जिसे वह दक्षिणी तिब्बत का हिस्सा मानता है।
एक सवाल के जवाब में चीन के विदेश मंत्रालय की प्रवक्ता हुआ चुनयिंग ने कहा, ‘चीन-भारत सीमा के पूर्वी हिस्से के बारे में चीन का पक्ष हमेशा से स्पष्ट रहा है।’ वह हाल ही में नई दिल्ली में भारत के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल द्वारा सीमा विवाद के मुद्दे पर दिए गए संबोधन पर टिप्पणी कर रही थीं।
चुनयिंग ने कहा, ‘चीन दोस्ताना माहौल में भारतीय पक्ष के साथ मिलकर सीमा के मुद्दे को जल्द से जल्द सुलझाना चाहता है और द्विपक्षीय रिश्तों को आगे बढ़ाने के लिए और ज्यादा अनुकूल माहौल बना रहा है।’ दोनों देशों के बीच सीमा मुद्दे को लेकर अब तक 18 दौर की विशेष प्रतिनिधि स्तर की वार्ता हो चुकी है। डोभाल चीन-भारत सीमा वार्ता के लिए विशेष प्रतिनिधि हैं।
क्या कहा था डोभाल ने
डोभाल ने कहा था कि भारत-चीन रिश्तों के लिए सीमा बेहद जटिल का मुद्दा है। ऐसे जटिल मुद्दों को सुलझाने के लिए किसी बड़ी योजना पर काम करना होगा। उन्होंने कहा था कि हमारी चिंता पूर्वी क्षेत्र के बारे में खास तौर पर है, जहां अरुणाचल प्रदेश के तवांग पर दावा किया गया है, जो पूरी तरह से हमारे सिद्धांतों के खिलाफ है। डोभाल कहा था कि चीन मैकमोहन रेखा को म्यांमार तक तो मानता है, मगर भारतीय सीमा पर इसे तवज्जो नहीं देता है।
क्या है मैकमोहन रेखा
मैकमोहन रेखा भारत और चीन के बीच की अंतरराष्ट्रीय सीमा रेखा है, जिसे चीन नहीं मानता है। ग्रेट ब्रिटेन और तिब्बत के बीच 1914 में हुए शिमला समझौते के बाद तत्कालीन तिब्बत और ब्रिटिश भारत के बीच यह सीमा रेखा मानी गई थी। यह रेखा ब्रिटिश वार्ताकार सर हेनरी मैकमोहन के नाम से मशहूर है।
चीनी गणराज्य के प्रतिनिधियों ने भी शिमला समझौते में हिस्सा लिया था, मगर उन्होंने इस आधार पर तिब्बत के दर्जे एवं सीमाओं के बारे में मुख्य समझौते पर हस्ताक्षर करने से इंकार कर दिया कि तिब्बत चीन के अधीन है और उसे समझौते करने का हक नहीं है।
चीन में अफगान अधिकारियों और तालिबान की बैठक
चीन के शिंजिआंग प्रांत की राजधानी उरुमची में 19 और 20 मई को अफगान सरकार के एक प्रतिनिधि मंडल और तालिबान शीर्ष आतंकियों के बीच गुपचुप तरीके से बैठक हुई।
द वॉल स्ट्रीट जर्नल अखबार के मुताबिक बैठक में पाक तालिबान के शीर्ष आतंकी मुल्ला अब्दुल जलील, मुल्ला मोहम्मद हसन रहमानी और मुल्ला अब्दुल रजाक के अलावा चीनी अधिकारी और पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आईएसआई के प्रतिनिधि शामिल रहे। तालिबान के पूर्व शीर्ष कमांडर मौलवी कलामुद्दीन ने बताया कि शांति पर चर्चा के लिए उच्च स्तरीय बैठक की गई।
अखबार ने कहा है कि चीन की पहल पर आईएसआई की मदद से अफगान अधिकारियों और तालिबान के शीर्ष आतंकियों के बीच बैठक आयोजित की गई। हाल ही में चीन ने अफगान सरकार और तालिबान आतंकियों के बीच मध्यस्थता करने की इच्छा जताई थी। बैठक अफगान सरकार और तालिबान आतंकियों के बीच वार्ता की संभावना पर चर्चा करने के उद्देश्य से की गई।
अफगानिस्तान के हाई पीस काउंसिल के सदस्य रहे मोहम्मद मसूम स्टानिकजाई ने अफगान प्रतिनिधि मंडल का नेतृत्व किया। बैठक में पूर्व सांसद और गनी के गठबंधन के साझीदार मोहम्मद असीम के सहयोगी अब्दुला अब्दुला ने भी हिस्सा लिया। हालांकि इस बाबत चीन और पाकिस्तान की ओर से किसी तरह की टिप्पणी नहीं आई।