बांबे हाईकोर्ट का कहना है कि अगर तलाक के मामले में महिला एक बार पूरा मुआवजा ले चुकी है, तो बच्चों की देखभाल के लिए उसे अलग से पैसा नहीं मिलना चाहिए। जस्टिस रोशन दल्वी ने महिला के पति की ओर से दायर याचिका पर यह फैसला सुनाया।
निचली अदालत का फैसला निरस्त करते हुए जस्टिस दल्वी ने कहा, ‘जब एक पार्टी बच्चे की कस्टडी रखने का फैसला करती है, तो वह फुल एंड फाइनल सेटलमेंट से पहले निश्चित राशि की मांग कर सकती है।’ 2005 में तलाक से पहले पति ने स्थायी सेटलमेंट के रूप में 7 लाख रुपये पत्नी को और 3 लाख रुपये बच्चे की देखभाल के लिए देना तय हुआ था। यह पैसा चार किश्तों में दिया जाना था, जिनकी तीन किश्तें दी जा चुकी हैं। मगर चौथी और अंतिम किस्त से पहले महिला ने अपने बच्चे के मुआवजे के लिए फैमिली कोर्ट में आवेदन कर दिया।
तलाक के समय उनका बच्चा पहली कक्षा में पढ़ता था और अब वह 9वीं कक्षा में पढ़ता है। बच्चे की ट्यूशन फीस, मेडिकल फीस तथा अन्य खर्चें भी बढ़ गए हैं। इसका भुगतान करने की जिम्मेदारी पिता पर है। हालांकि हाई कोर्ट ने इस याचिका को खारिज कर दिया और कहा कि इस तरह के आवेदन प्रक्रिया के खिलाफ हैं और इसे अनुमति नहीं मिलनी चाहिए।