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कटी लाशें उठाने को मजबूर नाबालिग

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ओडिशा के कटक शहर में रेलवे स्टेशन से हाल ही में दो ऐसे नाबालिगों को छुडाया गया है जिनसे ट्रेन से कटी लाशों को ढोने का काम लिया जा रहा था।
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इनमें से एक अमर (बदला हुआ नाम) ने बीबीसी को बताया कि पिछले  एक साल में उन्होंने पटरियों पर पड़ी कम से कम 200 लाशें उठाई हैं।

वे कहते हैं, "इनमें से कई लाशें दो, तीन दिन और कभी कभी एक हफ्ता या उससे भी ज़्यादा पुरानी होती थीं। ज्यादातर पुरानी लाशें सड़ी-गली होती थीं। लेकिन हमें शव उठाने के लिए दस्ताने भी नहीं दिए जाते थे। इसलिए हम हाथों में पॉलीथिन लपेटकर यह काम करते थे।"

इतना ही नहीं, कटक और आसपास के इलाकों से कूड़े के बोरों में लाशों के टुकड़े भर कर कटक स्टेशन पहुँचाने के बाद उन्हें एससीबी मेडिकल कॉलेज जाना पड़ता था जहाँ बच्चों के हाथों लाशों की चीरफाड़ भी कराई जाती थी।
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पोस्टमॉर्टम के बाद शवों को इलेक्ट्रिक शवदाह गृह पहुँचाने के बाद ही उनका काम समाप्त होता था।

प्रति लाश 400 रुपये

हमने इस बारे में एससीबी के अधिकारियों की प्रतिक्रिया लेने की कोशिश की, लेकिन उसमें कामयाबी नहीं मिली।

अमर ने बताया कि इन सभी कामों के लिए उन्हें प्रति शव 400 रुपए ही मिलते थे। लेकिन बताया जाता है कि रेलवे की ओर से हर लाश के लिए 3,000 रुपए दिए जाने का प्रावधान है।

जाहिर है कि बाकी रकम रेलवे पुलिस के अधिकारियों और इस काम के लिए नियुक्त संस्था के कार्यकर्ताओं की जेब में जाती रही होगी।

अमर के साथी 15 साल के सुरेश (बदला हुआ नाम) के साथ बातचीत के दौरान एक और चौंका देने वाली बात सामने आई।

उनका कहना था कि रेलवे पुलिस के गश्ती कर्मचारी उन्हें चेतावनी देते थे कि 'बड़े बाबू' के पूछने पर वह अपनी उंम्र 19 बताएं।

जांच के आदेश

रेलवे पुलिस के आईजी महेंद्र प्रताप ने जांच के आदेश दिए हैं।

सुरेश बताते हैं, "वे हमें धमकी देते थे कि अगर हमने सही उम्र बताई तो वे हमें बुरी तरह पीटेंगे और प्लेटफॉर्म पर सोने नहीं देंगे। यह कोरी धमकी नहीं थी। हमें वे सचमुच मारते थे, कभी कभी तो उल्टा लटकाकर।"

अमर के बदन पर मार के निशान अब भी हैं। चार महीने पहले 'काम' करने से इनकार करने पर उसे इतनी बुरी तरह से पीटा गया था कि उसका दाहिना हाथ टूट गया।

इन सारे आरोपों के बारे में हमने रेलवे पुलिस के आईजी महेंद्र प्रताप से पूछा तो उनका कहना था कि इस घटना के बारे में उन्हें मीडिया से ही पता चला और इसके बाद उन्होंने जांच के आदेश दे दिए हैं।

स्टेशन ही ठिकाना

कटक चाइल्ड वेलफेयर कमेटी के सदस्य ने कहा, "हम इस मामले को गंभीरता से ले रहे हैं और जांच में अगर किसी अधिकारी को दोषी पाया गया तो उसके खिलाफ सख्त कारवाई होगी।"

इस पूरे प्रकरण में जो एक सवाल बारबार उठता है, वह यह है कि आखिरकार बच्चों को ही इस काम में क्यों इस्तेमाल किया जाता है?

इस पर कटक चाइल्ड वेलफेयर कमिटी के अध्यक्ष बिकाश महापात्र कहते हैं, "बच्चे इस काम के लिए इनकार नहीं कर सकते हैं क्योंकि रेलवे स्टेशन ही उनका ठिकाना है। मना करने पर उन्हें निकाल दिए जाने की धमकी दी जाती है।"

"चूँकि इन बच्चों का कोई घर, परिवार नहीं है इसलिए उन्हें मजबूरन अधिकारियों की बातें माननी ही पड़ती है।"
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बिखरी हुई जिंदगी

दोनों बच्चे अब कटक के 'चाइल्ड लाइन' में हैं और बेहद खुश हैं।

दोनों ड्राइवर बनना चाहते हैं। उनकी बिखरी हुई ज़िंदगी अब धीरे धीरे पटरी पर आ रही है।

लेकिन देश में शायद अब भी सैंकड़ों ऐसे बच्चे होंगे जो पटरी से कटी हुई लाशें उठकर उन्हें मुर्दाघर पहुंचा रहे होंगे।
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