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इंदिरा की खातिर अपने लाडले से बागवत कर उठी बागी बलिया!

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इंदिरा गांधी की हत्या के बाद हुए दिसंबर 1984 के लोकसभा चुनाव में एक और राजनीतिक दिग्गज ने शिकस्त खाई थी, उनका नाम है चंद्रशेखर।
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जनता पार्टी के अध्यक्ष चंद्रशेखर हालांकि प्रधानमंत्री तो नवंबर 1990 में बने थे, लेकिन राष्ट्रीय राजनीति में उनकी बड़ी हैसियत इसके पहले बन चुकी थी।

इसलिए 1984 के लोकसभा चुनाव में उनकी पराजय ने सबको चौंका दिया था, क्योंकि पूर्वी उत्तर प्रदेश की जिस बलिया लोकसभा सीट से वह चुनाव लड़ते थे, वहां से पहले कभी नहीं हारे थे।

उनकी हार वह भी एक ऐसे शख्स से, जिसे बलिया केबाहर कोई नहीं जानता हो, इसकी कल्पना चंद्रशेखर के विरोधी भी नहीं कर सकते थे।

युवा तुर्क गुट के अगुआ थे चंद्रशेखर

चुनावी राजनीति में बलिया और चंद्रशेखर एक दूसरे के पर्याय बन गए थे। बलिया को पहली ख्याति मिली थी 1857 के प्रथम स्वाधीनता संग्राम के नायक मंगल पांडे के नाम से जो बलिया के ही रहने वाले थे। इसके बाद बलिया को देश और दुनिया ने चंद्रशेखर के नाम से जाना।

समाजवादी आंदोलन से राजनीति में आने वाले चंद्रशेखर प्रख्यात समाजवादी चिंतक आचार्य नरेंद्र देव के अनुयायी थे।

बाद में वह कांग्रेस में शामिल हो गए और जल्दी ही कांग्रेस के शीर्ष नेताओं में गिने जाने लगे। उन्हें कांग्रेस की राजनीति में युवा तुर्क गुट का अगुआ माना जाता था। इनमें चंद्रशेखर के अलावा रामधन, कृष्णकांत और मोहन धारिया जैसे नाम थे।

लेकिन 1974 में जब जय प्रकाश आंदोलन शुरु हुआ तो इंदिरा गांधी से मतभेदों की वजह से चंद्रशेख्रर ने कांग्रेस छोड़ी और जेपी के साथ हो लिए।

आपातकाल में जेल भी गए थे चंद्रशेखर

आपातकाल में उन्हें भी गिरफ्तार करके जेल में डाल दिया गया। आपातकाल के बाद 1977 में जब जनता पार्टी बनी तो चंद्रशेख्रर उसके पहले अध्यक्ष बने। इसलिए चंद्रशेखर राष्ट्रीय राजनीति में शिखर पर प्रधानमंत्री बनने से काफी पहले ही पहुंच गए थे।

1984 में चंद्रशेखर अपनी पुरानी लोकसभा सीट बलिया से जनता पार्टी के उम्मीदवार थे। उनका सम्मान करते हुए दूसरे गैर कांग्रेसी दल उनका समर्थन कर रहे थे। कांग्रेस ने उनके खिलाफ अपने पुराने उम्मीदवार जगन्नाथ चौधरी को मैदान में उतारा था।

राजपूतों (ठाकुरों) और यादवों की बहुतायत वाले बलिया में चंद्रशेखर सर्वमान्य नेता थे, लेकिन उनके चुनाव का मूल जनाधार राजपूत ही होते थे। जबकि जगन्नाथ चौधरी यादव बिरादरी से सम्मानित नेता थे। लेकिन उनकी राजनीति का दायरा बलिया तक ही सीमित था।

इंदिरा से हो रही थी चंद्रशेखर के काम की तुलना

चंद्रशेखर पहले भी चौधरी को हरा चुके थे, इसलिए वह अपनी जीत के प्रति आश्वस्त थे। इसलिए वह देश भर में जनता पार्टी के उम्मीदवारों के लिए प्रचार कर रहे थे।

जबकि चौधरी बलिया के गावों में घूम घूम कर यही कह रहे थे कि चंद्रशेखर को कई बार आजमा चुके हो, इस बार इस स्थानीय कार्यकर्ता को मौका दो।

चंद्रशेखर पर विरोधियों का आरोप यह भी था कि उन्होंने बतौर सांसद बलिया के विकास के लिए कुछ नहीं किया। सबकुछ वैसा ही खस्ता हाल है जैसा कि पहले था। जबकि इंदिरा गांधी ने रायबरेली को चमका दिया था।

चुनाव के आखिरी दौर में चंद्रशेखर के समर्थकों ने उन्हें बताया कि इस बार चुनाव जीतना आसान नहीं है। तब चंद्रशेखर ने बलिया में आकर डेरा जमाया।
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इंदिरा की मौत से उपजी सहानुभूति लहर पड़ भारी

उन्होंने भी जनसभाएं शुरु की। जबकि चौधरी घर घर जा रहे थे और चंद्रशेखर चुनावी सभाओं के जरिए अपनी बात कह रहे थे।

चौधरी सड़क, बिजली, पानी, कानून व्यवस्था, नागरिक सुविधाओं और विकास का मुद्दा उठा रहे थे, वहीं चंद्रशेखर राष्ट्रीय मुद्दों पर अपने लिए वोट मांग रहे थे। कांग्रेस के खिलाफ आपातकाल की ज्यादतियों से लेकर नवंबर 1984 की सिख विरोधी हिंसा तक मुद्दे थे।

लेकिन मतदान के बाद जब नतीजा आया तो कांग्रेस के जगन्नाथ चौधरी से चंद्रशेखर चुनाव हार गए। कांग्रेस के पक्ष में चल रही सहानुभूति लहर और स्थानीय मुद्दे चंद्रशेखर के व्यक्तित्व पर भारी पड़े और राष्ट्रीय राजनीति स्थानीय आकांक्षाओं के आगे कमजोर पड़ गई।
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