मुजफ्फरनगर दंगे को राजनीतिक साजिश बताने वाले उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के 17 महीने के शासन में सांप्रदायिक तनाव और हिंसा की घटनाएं 100 का आंकड़ा पार कर चुकी हैं।
खुफिया एजेंसी आईबी की ओर से गृह मंत्रालय को दिए गए ताजा आंकड़ों के मुताबिक यह संख्या 107 है। इसमें मुजफ्फरनगर के मौजूदा दंगे भी शामिल हैं।
यह हालत तब है जब इस साल जनवरी के बाद आईबी और गृह मंत्रालय लगभग हर महीने उत्तर प्रदेश सरकार को सांप्रदायिक दंगों के गंभीर स्तर पर पहुंच जाने के प्रति आगाह करते रहे हैं।
आईबी की ओर से गृह मंत्रालय को दिए गए आंकड़ों के मुताबिक यूपी में जनवरी के बाद सांप्रदायिक तनाव की घटनाओं में जबरदस्त तेजी आई। 1 जनवरी से 31 अगस्त तक का आंकड़ा उठाएं तो यह संख्या 80 तक पहुंच रही है।
इस साल 5 मार्च को विधानसभा में दिए गए जवाब में अखिलेश ने खुद स्वीकार किया है कि उनके मुख्यमंत्री बनने के बाद से दिसंबर 2012 तक सांप्रदायिक दंगे की 27 घटनाएं हुई थीं।
अखिलेश ने 15 मार्च, 2012 को मुख्यमंत्री पद संभालते ही राज्य में कानून व्यवस्था को चुस्त रखने का भारी-भरकम वादा किया था। लेकिन सांप्रदायिक दंगों के अलावा हत्या, अपहरण और बलात्कार की घटनाओं के आंकड़े भी सपा सरकार के सभी दावों की पोल खोल रहे हैं।
यूपी सरकार के ही आंकड़ों के मुताबिक अगस्त 2013 तक पूरे राज्य में हत्या की 4731, अपहरण की 2921 और बलात्कार की 2614 घटनाएं दर्ज की गई हैं।
राज्यों के हालात पर नजर रखने वाली केंद्रीय एजेंसियों के मुताबिक यूपी में सपा की मूल राजनीतिक ताने बाने की गड़बड़ी इसकी वजह है।
सपा के पुराने शासनकाल में भी कानून व्यवस्था के लगभग यही हालात थे। यही वजह है कि अखिलेश सरकार बनने के बाद लोगों के जेहन में पहला सवाल कानून व्यवस्था को लेकर ही था।
गृह मंत्रालय के वरिष्ठ अधिकारी के मुताबिक लगातार मिल रही खुफिया सूचनाओं के आधार पर पिछले साल भर से सभी संवेदनशील राज्यों को सांप्रदायिक तनाव के प्रति लगातार आगाह किया जा रहा था।
सभी राज्यों ने इसे रोकने के प्रयास किए। फिर भी इस साल जनवरी से अगस्त तक देश भर में 452 छोटे बड़े सांप्रदायिक तनाव हुए।
हालांकि कहीं से भी बड़े दंगे की सूचना नहीं आई। लेकिन यूपी के सभी संवेदनशील इलाकों से हिंसा की खबर लगातार आती रही। इनमें मथुरा, बरेली और गाजियाबाद, संभल, प्रतापगढ़ बिजनौर और इलाहाबाद की बड़ी घटनाएं थीं।
अधिकारी के मुताबिक यूपी सरकार इतने पर भी नहीं संभली और मुजफ्फरनगर में दंगे ने विकराल रूप ले लिया जिसे प्रशासन आसानी से रोक सकता था।