विजय दशमी के बाद सरकार के सामने कैबिनेट में फेरबदल के जरिए अपना चेहरा बदलने और अलग तेलंगाना राज्य बनाने की पुरानी मांग को सिरे चढ़ाने की चुनौती होगी। दरअसल, आर्थिक सुधारों की गाड़ी को टॉप गियर पर चलाने के बाद यूपीए सरकार और बड़े सियासी कदम उठाने के संकेत दे रही है। सरकार और कांग्रेस के शीर्ष स्तर पर अलग तेलंगाना राज्य को लेकर कई दौर की बात हो चुकी है। आंध्र प्रदेश में डूब रही नैया को पार लगाने की कवायद के तहत कांग्रेस यह बड़ा राजनीतिक जोखिम मोल लेने की तैयारी में है।
अलग तेलंगाना राज्य पर प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और पार्टी अध्यक्ष सोनिया गांधी की अध्यक्षता में कांग्रेस कोर ग्रुप में कई दौर की बातचीत हो चुकी है। वहीं राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी से भी इस मसले पर सोनिया, प्रधानमंत्री और गृहमंत्री की बात हुई है। उधर, भाजपा भी समर्थन की बात कह रही है। कांग्रेस के शीर्ष स्तर का मानना है कि प्रदेश के आने वाले विधानसभा और लोकसभा चुनाव में अगर अलग राज्य की मांग पर कुछ ठोस नहीं किया गया तो कांग्रेस का सफाया होना तय है।
तेलंगाना क्षेत्र भर में ही लोकसभा की दर्जन से ज्यादा सीटें हैं। अगर अलग राज्य की मांग को पूरा किया जाता है तो कांग्रेस के पास यहां ज्यादा से ज्यादा सीटें जीतने का मौका होगा। दूसरी तरफ कांग्रेस से अलग हुए पूर्व मुख्यमंत्री और स्वर्गीय वाई एस रेड्डी के बेटे जगन मोहन रेड्डी के साथ समझौते की बात पर्दे के पीछे से चल रही है। जगन से समझौता सिरे चढ़ता है तो आंध्र प्रदेश भर में कांग्रेस की स्थिति सुधर सकती है।
वहीं तेलंगाना क्षेत्र में पार्टी की नैया अलग राज्य की मांग पर टिकी है। कुल मिलाकर अलग तेलंगाना राज्य पर फैसला करना कांग्रेस की सियासी मजबूरी बन गई है। उधर, तेलंगाना राष्ट्र समिति प्रमुख चंद्रशेखर राव भी कांग्रेस और यूपीए सरकार पर इस मसले पर जल्द फैसला लेने का दबाव बना रहे हैं। चंद्रशेखर राव ने तो अलग राज्य की मांग पूरा होने के लिए कांग्रेस के सामने तेलंगाना राष्ट्र समिति को कांग्रेस में विलय करने की बात तक कह दी है।