सरकारी तंत्र में लगे भ्रष्टाचार के दीमक को सूचना के अधिकार (आरटीआई) के जरिए जगजाहिर करने वाले कार्यकर्ताओं की सुरक्षा और संरक्षण के मसले पर राज्यों की पुलिस का रवैया लचर है। यही वजह है कि केंद्रीय गृह मंत्रालय की ओर से निर्देश दिए जाने के बावजूद राज्यों में पुलिस शिकायत मिलने के बावजूद तभी कार्रवाई करती है, जब कोई हादसा हो जाता है। 2007 से अब तक देशभर में धमकी, उत्पीड़न और हत्या के करीब 150 ऐसे मामले प्रकाश में आए हैं, जिनमें शिकायत के बावजूद पुलिस ने कोई कदम नहीं उठाया और घटना घट गई।
राजधानी दिल्ली हो या फिर विकास की राह पर चलने वाला गुजरात, हरेक राज्य में आरटीआई कार्यकर्ताओं की शिकायतों पर पुलिस की लापरवाही उन्हें खतरे में डालती रही है। यही नहीं, जब लोगों ने राज्य प्रशासन को कोसा तो आला अधिकारियों की ओर से पुलिस महकमे को जारी किया गया फरमान थमाकर प्रदेश सरकार के दामन को पाक-साफ करार दे दिया।
आरटीआई कार्यकर्ता गौरव अग्रवाल के मुताबिक उन्हें कई बार धमकियां मिल चुकी है। दो साल पहले जान से मारे जाने की धमकी मिलने पर उन्होंने राज्य पुलिस से भी शिकायत की थी। लेकिन पुलिस ने उसे कानूनी धाराओं में उलझाकर सुरक्षा मुहैया कराने से टाल दिया। जबकि राज्य के गृह विभाग के सचिव ने स्पष्ट तौर पर आरटीआई कार्यकर्ताओं को धमकी मिलने पर तत्काल सुरक्षा मुहैया कराने का निर्देश दिया था।
उत्तर प्रदेश ही नहीं, असम के संजीब टंटी, महाराष्ट्र के अभय पाटिल, हरियाणा के जय भगवान और गुजरात के अय अमबालिया सहित कई राज्यों के आरटीआई कार्यकर्ता पुलिस के इस रवैये से प्रभावित हैं। विभिन्न राज्यों में आरटीआई कार्यकर्ताओं की शिकायत पर 55 मामले तब दर्ज किए गए जब उन पर हमला हो गया।
जबकि उत्पीड़न के 70 और हत्या के 25 मामलों में यह सामने आया है कि पुलिस को घटना से पहले लिखित शिकायत भेजकर आगाह किया गया था। केंद्र सरकार व्हिसल ब्लोअर की सुरक्षा और संरक्षण के लिए लोकसभा में विधेयक पास करा चुकी है और राज्यसभा में भी पेश कर चुकी है जो शीत सत्र में कानून बन सकता है। लेकिन आरटीआई कार्यकर्ताओं का सवाल है कि महज कानून बनाए जाने से पुलिस महकमे का रवैया बदला जा सकेगा।