आतंकी घटनाओं की जिम्मेदारी लेने से बिदकने वाली बिहार पुलिस नरेंद्र मोदी की हुंकार रैली में हुए धमाके से भी सबक लेने को तैयार नहीं है।
आतंकवाद के प्रति बिहार के राजनीतिक और पुलिस नेतृत्व की उदासीनता से केंद्र सरकार खासी नाराज है। संवैधानिक तौर पर कानून-व्यवस्था का विषय राज्य सरकार का होने की वजह से केंद्र अपनी नाराजगी और नाखुशी जताने के अलावा कुछ नहीं कर पा रहा है।
गृहमंत्रालय के शीर्षस्थ सूत्रों के मुताबिक बिहार पुलिस के लचर रवैये की वजह से राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) को भी पटना धमाकों की छानबीन में काफी दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है। यही वजह है कि एनआईए तमाम कोशिशों के बावजूद इस सीरियल बम धमाके की जांच पूरी तरह शुरू नहीं कर पा रही है।
सूत्रों ने बताया कि आतंकवाद के प्रति बिहार पुलिस की सुस्ती का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि तमाम खुफिया निर्देशों के बावजूद आतंकी लाखों की भीड़ में छह धमाके करने में कामयाब हो गए।
इतना ही नहीं धमाके के अगले तीन दिन तक बम मिलते रहे। यह कवायद भी एनआईए की कोशिशों की वजह से शुरू हुई। सूत्रों ने बताया कि अगर बिहार पुलिस के ऊपर छोड़ दिया जाता तो ये बम अब तक गांधी मैदान में ही पड़े रहते।
गृहमंत्रालय इस बात से भी नाराज है कि मुजफ्फरपुर में एनआईए की हिरासत से एक अहम गवाह भाग गया। वह जिस थाने से भागा वहां की सुरक्षा की जिम्मेदारी बिहार पुलिस की थी।
सूत्रों ने खुलासा किया कि गवाह को तो कुछ देर बाद ही पकड़ लिया गया लेकिन उसके भागने और पकड़ में आने की खबर मीडिया में देख कर इंडियन मुजाहिदीन (आईएम) का वह अहम आतंकी फरार हो गया जिसके लिए उस गवाह से पूछताछ की जा रही थी। बिहार पुलिस के इस रवैये के चलते एनआईए ने उस थाने में लिखित शिकायत दर्ज कराई है।
गृह मंत्रालय के सूत्रों ने बताया कि बिहार पुलिस सिर्फ आतंकवाद के मामले में ही नहीं बल्कि नक्सल विरोधी अभियान में भी ठंडी प्रतिक्रिया देती रही है। केंद्रीय बलों के देश व्यापी नक्सल विरोधी अभियान में बिहार सबसे कमजोर कड़ी साबित हुआ है।