उद्योगों और अवस्थापना परियोजनाओं के लिए भूमि अधिग्रहण को ज्यादा सरल बनाने के लिए केंद्र सरकार ने अध्यादेश के जरिए भूमि अधिग्रहण पुनर्वास एवं मुआवजा अधिनियम-2013 में जो बदलाव किए हैं, उनसे मौजूदा भूमि अधिग्रहण कानून अब बेहद नरम हो जाएगा।
हालांकि भाजपा की किसान राजनीति के दबाव को देखते हुए भूस्वामियों (किसानों) को जमीन अधिग्रहण के बदले दिए जाने वाले मुआवजे के प्रावधानों में कोई बदलाव न करके सरकार ने किसान हितों की सुरक्षा का संदेश जरूर दिया है, लेकिन पीपीपी की खिड़की के जरिए सरकार ने निजी क्षेत्र को किसानों की जमीन लेने के सारे रास्ते खोल दिए हैं।
यूपीए सरकार के दौरान संसद में भाजपा सहित सभी दलों की सहमति से 2013 में जो भूमि अधिग्रहण कानून पारित किया गया था उसमें सरकारी या गैर सरकारी किसी भी परियोजना के लिए भूमि अधिग्रहण के लिए संबंधित क्षेत्र के भूस्वामियों की कुल आबादी के 70 फीसदी लोगों की सहमति अनिवार्य बनाया गया।
लेकिन अध्यादेश में पांच क्षेत्रों औद्योगिक गलियारा, राष्ट्रीय सुरक्षा, रक्षा, ग्रामीण अवस्थापना विद्युतीकरण और सामाजिक अवस्थापना के लिए सार्वजनिक निजी भागीदारी (पीपीपी) की परियोजनाओं के लिए भूमि अधिग्रहण के लिए भूस्वामियों के 70 फीसदी हिस्से की सहमति की अनिवार्यता को खत्म कर दिया गया है।