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सरकारी चंगुल से आजाद होना चाहती है सीबीआई

Wed, 17 Jul 2013 12:29 AM IST
नई दिल्ली/ब्यूरो
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केंद्र सरकार के पिंजरे का ‘तोता’ सीबीआई अब खुलकर उड़ने को बेताब है। अपनी आजादी को लेकर सुप्रीम कोर्ट में दाखिल किए हलफनामे में सीबीआई ने अपनी मंशा जाहिर कर दी है।
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जांच एजेंसी ने कहा है कि वित्तीय स्वायत्तता के बिना सरकारी पिंजरे से एजेंसी का निकलना मुमकिन नहीं है क्योंकि इसके बिना जांच के उच्च मानदंड भी हासिल नहीं किए जा सकते।

हलफनामे में एजेंसी ने प्रस्तावित जवाबदेही आयोग का विरोध करते हुए निदेशक का कार्यकाल तीन साल किए जाने पर जोर दिया है।

सीबीआई ने स्वायत्तता के मुद्दे पर सरकार की ओर से दाखिल हलफनामे के इस जवाब में पिंजरे से बाहर निकलने की छटपटाहट साफ जाहिर की है।

एजेंसी ने 14 पन्नों के हलफनामे में कहा है कि सीबीआई निदेशक को केंद्र सरकार के सचिव स्तर का दर्जा दिया जाए जिससे वह सीधे मंत्री को रिपोर्ट कर सके।

इस समय निदेशक को कार्मिक एवं प्रशिक्षण मंत्रालय (डीओपीटी) के जरिए मंत्री से संपर्क साधना पड़ता है। मालूम हो कि डीओपीटी एक अलग मंत्री के अधीन है और यह मंत्री सीधे प्रधानमंत्री को जवाबदेह हैं।
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सीबीआई के पुलिस अधीक्षक विधि कुमार बिर्दी की ओर से दायर हलफनामे में कहा गया है कि वित्तीय अधिकार मिलने तथा सीधे मंत्री के मातहत काम करने से सरकारी हस्तक्षेप कम हो सकता है।

वित्तीय स्वायत्तता के अभाव में जांच की रफ्तार पर प्रभाव पड़ता है। संपूर्ण और उच्च स्तरीय जांच के लिए वित्तीय स्वतंत्रता जरूरी है। हालांकि सीबीआई ने राजनीतिक दखलंदाजी जैसी शब्दावली से परहेज किया है।

सीबीआई ने यह भी कहा है कि पैसे की कमी के कारण वह तकनीकी जांच के लिए सीए, इंजीनियर, विधि-विज्ञान विशेषज्ञ, ऑडिटर आदि की सेवाएं नहीं ले पाती।

सॉफ्टवेयर और हार्डवेयर की खरीद में पैसे की कमी आड़े आती है। सीबीआई की कार्यकुशलता को बेहतर करने के लिए उसके हाथ आर्थिक रूप से मजबूत करने की सख्त जरूरत है।
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यहां हैं मतभेद
1. सरकार ने सीबीआई निदेशक का कार्यकाल दो साल रखने की बात कही थी
2. भ्रष्ट सीबीआई अधिकारियों के लिए जवाबदेही आयोग बनाने का प्रस्ताव  

1. सीबीआई चाहती है कम से कम तीन साल हो निदेशक का कार्यकाल
2. जांच एजेंसी ने आयोग गठित करने का किया विरोध, कहा-इसके लिए एजेंसी में आंतरिक तंत्र है
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