सरकारी आदेश से हुए गठन के पचास साल बाद गुवाहाटी हाईकोर्ट के फैसले से खुद को ठगा महसूस कर रही सीबीआई ने अपने अस्तित्व को बचाने के लिए सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है।
केंद्रीय एजेंसी के गठन को असंवैधानिक करार देने वाले हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ सरकार के बाद सीबीआई खुद कानूनी जंग में उतरी है।
एजेंसी ने विशेष अनुमति याचिका में कहा है कि हाईकोर्ट ने इस मामले में सुप्रीम अदालत के फैसलों को ताक पर रखकर आदेश जारी किया है, जिसे उचित नहीं माना जा सकता है। हालांकि सर्वोच्च अदालत की ओर से सरकार की अपील पर 9 नवंबर को हाईकोर्ट के फैसले पर रोक लगाई जा चुकी है।
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सर्वोच्च अदालत सीबीआई और सरकार की याचिकाओं पर शुक्रवार को सुनवाई करेगी। सरकार ने इस मामले में दलील दी है कि एजेंसी के तहत देशभर में चल रहे हजारों आपराधिक मामलों में हाईकोर्ट के फैसले का विपरीत प्रभाव है। यदि इस पर तत्काल रोक नहीं लगाई गई तो न्याय का अहित होगा।
वहीं एजेंसी ने कहा है कि 1 अप्रैल, 1963 में केंद्र सरकार की ओर से अनुच्छेद 73 के तहत जारी किए गए कार्यकारी आदेश की वैधता पर सवाल नहीं उठता। ऐसे में हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले को लांघकर अपना फैसला दिया है। लेकिन हाईकोर्ट यह परखने में असफल रहा कि सरकार की ओर से जारी किए गए आदेश पर राष्ट्रपति की मुहर है।
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याद रहे कि सरकार ने सर्वोच्च अदालत से कहा है कि हाईकोर्ट के फैसले से नौ हजार ट्रायल और एक हजार जांच प्रभावित होंगी, जो सीधे तौर पर सीबीआई से जुड़ी हैं। एजेंसी में छह हजार कर्मचारी व अधिकारी हैं।
गुवाहाटी हाईकोर्ट ने नवेंद्र की याचिका पर सीबीआई को असंवैधानिक करार देने का फैसला दिया था। एजेंसी का कहना है कि हाईकोर्ट ने ऐसे कई पहलुओं पर गौर किए बगैर फैसला जारी किया, जो कानून की नजर में बहुत ही महत्वपूर्ण हैं। केंद्र की ओर से इस मसले पर कार्मिक विभाग (डीओपीटी) की ओर से शीर्षस्थ अदालत में याचिका दायर की गई थी।
गौरतलब है कि हाईकोर्ट ने सरकार के उस प्रस्ताव को निरस्त कर दिया था जिसके जरिए सीबीआई का गठन हुआ था। एजेंसी की तमाम कार्रवाईयों को असंवैधानिक करार दिया था।
हाईकोर्ट ने कहा था कि हम सीबीआई को गठित करने वाले एक अप्रैल, 1963 के प्रस्ताव को रद्द करते हैं। सीबीआई न तो दिल्ली विशेष पुलिस प्रतिष्ठान (डीएसपीई) का कोई हिस्सा है और न उसका अंग है।
सीबीआई को 1946 के डीएसपीई अधिनियम के तहत गठित पुलिस बल के तौर पर नहीं लिया जा सकता। एजेंसी की गतिविधियां संविधान के अनुच्छेद 21 को आघात पहुंचाती है। इसलिए इसे असंवैधानिक मानकर रद्द किया जाता है।