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सोनिया तो मांगने से रही लेकिन क्या राहुल लौटाएंगे मां का कर्ज?

Sat, 05 Apr 2014 05:58 PM IST
वेद विलास उनियाल/अमर उजाला, नई दिल्ली
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अब आप यह न सोचिए कि परिवार में रुपयों का लेन देन, हिसाब-किताब ऊंचे परिवारों में नहीं होता। वहां दस-पांच लाख की कोई अहमियत नहीं होती। लिए और भूल गए। राजनीति में देश के प्रथम परिवार में सोनियाजी को पता है कि उन्होंने अपने बेटे राहुल को नौ लाख रुपए दे रखे हैं। हालांकि यह बात कहीं नहीं कही गई कि सोनियाजी इन रुपयों को मांग रही है या उन्हें इसकी जरूरत है। लेकिन अपने संसदीय क्षेत्र में चुनाव का नामांकन कराते समय इसका जरूर उल्लेख किया गया।
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छोटे और मध्यम परिवारों के लिए यह सूचना सुकून दे सकती है कि उनकी तरह राहुल को भी रुपए पैसों की जरूरत पड़ती है। वह भी अपनी मां से कर्ज लेते हैं। और उनकी मां भी इसको रिकार्ड में रखती हैं। चुनाव के समय इस बात पर कांग्रेस जता सकती है कि राजनीति में राहुल चाहे कितने बड़े ओहदे और अधिकारों से संपन्न हों लेकिन उन्हें भी पैसे की जरूरत पड़ जाती है। हालांकि उन्होंने भले अपनी मां से लिए नौ लाख रुपए वापस न किए हों, लेकिन हाल में अपनी बहन प्रियंका को दो जगह अपनी जमीन दी है।

इसलिए यह नहीं कहा जा सकता है कि वह धन के मामले में उन्हें किसी तरह की दिक्कत है। अगर ऐसा होता कि बहन को जमीन देने से पहले, वह उस जमीन को बेचते और मां से लिया हुआ रुपया चुकाते। अब यह परिवार की बात है, अगर सोनियाजी अपना दिया रुपया वापस न लेना चाहें तो कोई दूसरा क्या कह सकता है। और सोनिया ने ऐसा कहा भी कब है। यह तो केवल एक सूचना भर है कि राहुल भी कर्जदार है। भले ही उन्हें कर्ज देने वाली उनकी मां सोनिया ही हों।
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नृत्य बालाओं के साथ निकले नेताजी

आखिर उनका चुनावी पर्चा भरा जाना था। कुछ अलग तो होना ही था। बिहार में एक नेताजी चुनाव प्रचार के लिए निकले तो हूजूम निकल पड़ा। इतनी भीड़ तो यही बताती है कि नेताजी की गजब की लोकप्रियता है। सड़क के दोनों ओर लोगों की कतारें लग गई। युवाओं के लिए खास नजारा था। उनके लिए शायद नेताजी के अभिवादन का कोई मतलब रहा हो। जुलूस में नारे और फूलों की सुगंध से भी उन्हें शायद कोई मतलब नहीं रहा हो। उनकी नजर तो उन नृत्य बालाओं के डांस पर थी जो नेताजी के साथ साथ चल रही थी।

दरभंगा से राजद के अशरफ फातमी ने अपने चुनाव के लिए पर्चा भरते हुए कुछ अनोखा करने की सोची। क्यों न नृत्य संगीत से अपनी प्यारी जनता का दिल बहलाया जाए। इसलिए कुछ लड़कियों को उन्होंने वाहन में बिठाया। जुलूस चलता रहा, धड़कते गीत संगीत के साथ ठुमके होते रहे। युवाओं के लिए यह अच्छा खासा आयोजन था।

उधर वाहन में सुंदरियां ठुमके लगा रही थीं, वहीं सड़कों पर युवाओं के नृत्य हो रहे थे। युवाओं के लिए ऐसे क्षण होते हैं जब उन्हें यह मतलब नहीं कि कौन नेताजी चल रहे हैं। उनके लिए महत्व उन धड़कते गीतों और नृत्यों का है। कम से कम दरंभगा के नेताजी ने युवाओं की इस भावना का तो ख्याल रखा।

नहीं लडूंगा, नहीं लडूंगा

अब तक कांग्रेस में इस बात को लेकर झगड़े होते थे कि फलां सीट पर मैं लडूगां। मैं नहीं लड़ा तो मेरे परिवार का कोई लड़ेगा। लेकिन इस बार यह दिलचस्प है कि कुछ सीट ऐसी हैं जहां नेता कह रहे हैं मैं नहीं लड़ूगा। मैं ही नहीं, मेरे परिवार का भी कोई नहीं लड़ेगा। पौड़ी में सतपाल महाराज रुठे हुए थे। उनके भाजपा में चले जाने के बाद कांग्रेस ने एक सेना अधिकारी की तलाश कर ली।

लेकिन उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा की टिहरी सीट कांग्रेस के लिए पेंच बनी हुई हैं। कांग्रेस हाईकमान कह रहा है कि उन्हें ही चुनाव लड़ना पड़ेगा। टिहरी में कांग्रेस की हालत को समझा जा सकता है कि कांग्रेस चाहती है कि जैसे भी हो विजय बहुगुणा चुनाव लड़ लें। इससे ज्यादा फजीहत कराना ठीक नहीं। मगर विजय बहुगुणा ने हरीश रावत के मुख्यमंत्री बनने के बाद जब अपने खासमखास लोगों के साथ टिहरी संसदीय क्षेत्र के कुछ इलाकों का भ्रमण किया तो उन्हें यहां हालात समझ में आ गए। उधर पौड़ी की सीट पर तो सतपाल पलटी मार कर भाजपा में शामिल हो गए।

वह अब भुवन चंद्र खण्डूड़ी को अपने दम पर जिताने का वादा कर रहे हैं, लेकिन इधर बहुगुणा फंसे हुए हैं। वह किसी तरह चुनाव के फेर में नहीं पड़ना चाहते। खासकर लोकसभा का उपचुनाव में उनके बेटे साकेत को करारी शिकस्त मिली। ऐसे में क्षेत्र में अच्छी स्थिति नहीं देखते हुए विजय बहुगुणा फिर अपने पर दांव नहीं चलना चाहते। साकेत ने चुनाव उन्हीं के नाम पर लड़ा था। अगर फिर पराजय मिलती है तो आगे इसे अपनी विश्वस्त सीट नहीं कह पाएंगे।

मधुसूदनजी का पोस्टर

कॉलेज के चुनाव में भी ऐसा नहीं देखा जाता। विश्वविद्यालय के चुनाव में अगर छात्रों का एक गुट अपने नेता का पोस्टर कहीं टांगता या चिपकाता है, तो दूसरा गुट उस जगह अपने पोस्टर नहीं लगाता। कुछ दूरी पर उनके छात्र नेता के पोस्टर लगे होते हैं। फिल्म सिनेमा में भी इस परंपरा को बड़ी तहजीब से निभाया जाता रहा है। कभी भी एक पोस्टर के ऊपर दूसरा पोस्टर नहीं लगा।

एक सिनेमा हॉल में लगी फिल्म के पोस्टर अगर कहीं पर चिपके हों तो दूसरी फिल्म के पोस्टर दूसरी जगह नजर आती थी। कभी ऐसा नहीं हुआ कि कहीं 'बॉबी' का पोस्टर लगा हो उसके ऊपर 'हाथ की सफाई' फिल्म का पोस्टर लग जाए। शाहरूख खान और सलमान खान आपस में कितना झगड़े लेकिन सिनेमा के पोस्टर लगाने वाले आपस में नहीं झगड़ते। दोनों की फिल्मों के पोस्टर दूर-दूर लगे होते हैं। एक पोस्टर के ऊपर दूसरा पोस्टर नहीं लगता। या किसी पोस्टर को फाड़कर उसके ऊपर दूसरा पोस्टर नहीं लगाया जाता। मगर वडोदरा की राजनीति में ऐसा नहीं हुआ। वहां पोस्टर भी फाड़े गए।

और फाड़ने वाले ने खुल कर कहा कि उसे अपना पोस्टर नहीं लगाने दिया, इसलिए उसने दूसरे का पोस्टर फाड़ दिया। सच क्या है मालूम नहीं। लेकिन कांग्रेस के उम्मीदवार मधुसूदन मिस्त्री को गुस्सा आया कि हर उपयुक्त जगह पर भाजपा उम्मीदवार नरेंद्र मोदी के पोस्टर लगे हैं। उन्हें अपने पोस्टर के लिए जगह ही नहीं मिलती । इसलिए उन्होंने पोस्टर फाड़ो मुहिम चलाई है। इस अभियान को स्वयं हाथ में लेते हुए वह खंभे में चढ़ गए और पोस्टर फाड़ने लगे। उनके अभियान से भाजपा की नाराजगी स्वाभाविक है। इसकी शिकायत की गई। बड़ोदरा में पोस्टर फाड़ने का अभियान खासी चर्चा का विषय बना हुआ है।
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संवेदना के साथ संभावना

बंगाल और हिंदी फिल्मों की अपनी समय की चर्चित अदाकारा सुचित्रा सेन के निधन पर परिजनों से सांत्वना जताने के लिए ममता बनर्जी एकाएक मुनमुन सेन के घर आईं तो इसे एक शिष्टाचार ही माना गया। सुचित्रा सेन विख्यात अभिनेत्री थीं, उनकी कला और सुंदरता बाद में आने वाली अभिनेत्रियों के लिए प्रतिमान बनी। इस नाते अगर मुख्यमंत्री स्वयं उनकी बेटी से मिलने आईं तो इसे महान अदाकारा के लिए श्रद्धांजलि के तौर पर देखा गया।

लेकिन राजनीति में हर क्षण का अपना महत्व होता है। अभिनेत्री मुनमुन सेन ने औपचारिक बातों में कहा कि वह चुनाव प्रचार करना चाहती हैं, दीदी का जवाब था, क्या  केवल चुनाव प्रचार। मुनमुन सेन को तब पता नहीं रहा होगा कि दीदी क्या फैसला कर चुकी हैं। यह उनका अपनी शैली हैं।

अब मुनमुन सेन बाकुड़ा से चुनाव लड़ रही है। ममता बनर्जी ने इस बार चुनाव में सेलिब्रिटी को खूब महत्व दिया है। बंगाल में सेलिब्रिटी पर विचार हो तो मुनमुन सेन के बिना वह चर्चा अधूरी ही रहती।
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