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मोदी के आने से पहले ही अधिकारियों में खौफ

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16वीं लोकसभा के चुनाव में अप्रत्याशित जीत दर्ज करने वाले निर्वाचित प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार के गठन में भले ही पांच दिन का समय बाकी हो, लेकिन अधिकारियों में उनका खौफ अभी से देखा जा सकता है।
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मंत्रालयों में अधिकारियों की व्यस्तता देखते ही बन रही है। सचिव से लेकर निदेशक तक की टेबल फाइलों से लदी हुई हैं। इन फाइलों में पिछले दो महीने से लेकर पांच वर्ष पूर्व के  मामलों का निपटान किया जा रहा है।

कामकाज को लेकर मंत्रालय इस कदर हरकत में आ गए हैं, जैसे दो माह पूर्व चुनाव आचार संहिता लगने से पहले थी।

तेजी से न‌िपटाई जा रही हैं फाइलें

ग्रामीण विकास मंत्रालय के विभिन्न विभागों के आधा दर्जन मामले भी शामिल हैं, जिसमें जमीन के रिकॉर्ड का कंप्यूटरीकरण, गरीबों की गिनती का काम, जल-जंगल और जमीन के लिए संघर्षरत 2.5 करोड़ परिवारों को आवास के लिए जमीन देने का फैसला भी शामिल है।

इसी प्रकार उपभोक्ता मामले के मंत्रालय में पेट्रोल-डीजल में मिलावट व घटतौली रोकने के लिए तेल कंपनियों, मंत्रालय व नापतौल विभाग के अधिकारियों की संयुक्त रूप से टीम बनाकर मौके पर जांच के लिए टीम बनाने के साथ ही उपभोक्ताओं के हित में लिए गए अन्य महत्वपूर्ण निर्णय अटके पड़े हैं।

स्वास्थ्य, कृषि, जल संसाधन और स्वच्छता मंत्रालय में यूपीए सरकार के कई महत्वपूर्ण फैसलों की फाइलें अभी तक निदेशकों की मेज से आगे ही नहीं बढ़ी हैं। अब जब मोदी की शपथ की तारीख तय हो चुकी है, तो इन सभी महकमों में फाइलों को निपटाने में अधिकारी दिन-रात एक किए हुए हैं।

मोदी के सख्त रवैये से परिचित हैं अधिकारी

कृषि मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी ने मोदी को लेकर गुजरात सरकार के अनुभव का जिक्र करते हुए कहा कि निर्वाचित प्रधानमंत्री कामकाज के मामले मे बहुत सख्त हैं।

वे गुजरात मे अपनी कैबिनेट के कामकाज की समय समय पर समीक्षा करते रहे हैं और लिए गए फैसलों की प्रगति रिपोर्ट देखते रहे हैं। इसलिए केंद्र सरकार के लगभग सभी मंत्रालयों में अधिकारी इन दिनों पुराने और लंबित कामकाज को निपटाने में लगे हुए हैं।
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अधिकांश मंत्रालयों में नहीं हुआ काम

वरिष्ठ अधिकारी मानते हैं कि पिछले पांच वर्षों के दौरान कुछ एक मंत्रालयों को छोड़ दें, तो अन्य अधिकांश मंत्रालयों में न ही कोई बड़ा फैसला हुआ और न ही कोई नया कामकाज।

जो छोटे मोटे फैसले होते भी थे, उन पर अमल हुआ या नहीं, इसकी सुध लेने वाला भी कोई नहीं था। इसलिए ज्यादातर मंत्रालयों में कामकाज लंबित पड़ा हुआ है।
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