प्रमोशन में आरक्षण के लिए यूपीए सरकार को संविधान संशोधन बिल लाने पर बाध्य करने वाली बसपा सुप्रीमो मायावती इस मुद्दे पर संसद में हुई सियासत को लेकर कांग्रेस और सरकार से बेहद खफा हैं। उन्होंने राष्ट्रीय राजनीति के क्षितिज पर सर्वसमाज की राजनीति को अपनी दूरगामी सियासत का एजेंडा बना लिया है।
आरक्षण बिल और यूपी की सियासत से लेकर अपने प्रधानमंत्री बनने के तमाम सवालों पर कुमारी मायावती ने अमर उजाला के कार्यकारी संपादक आशुतोष चतुर्वेदी और ब्यूरो चीफ संजय मिश्र से लंबी बातचीत की। पेश हैं इस बातचीत के मुख्य अंश:
प्रमोशन में आरक्षण बिल सरकार की पहल के बाद भी लोकसभा में क्यों अटक गया?कांग्रेस और केंद्र सरकार दिल से इस विधेयक को पास कराने के पक्ष में नहीं थी। अगर कांग्रेस चाहती तो इस समस्या का समाधान 2006 में ही हो जाता। तब एन. नागराज बनाम भारत सरकार के केस में सुप्रीम कोर्ट की संवैधानिक पीठ ने जो निर्णय दिया, उसमें तीन शर्तें थीं। इससे आरक्षण निष्प्रभावी हो गया। केंद्र ने तब सही तथ्य रखा होता तो सुप्रीम कोर्ट सही निर्णय लिया होता। यही नहीं अगर कांग्रेस वास्तव में दलितों की हितैषी होती तो वह रिव्यू में जाती। छह साल तक केंद्र के शांत रहने पर बसपा ने मजबूर होकर पिछले सत्र से इसकी लड़ाई लड़ी और शीत सत्र में राज्यसभा में इसे पारित कराया।
यूपीए सरकार पर सवाल उठाए जा रहे कि उसने सपा को भी खुश करने के लिए लोकसभा में पूरा जोर नहीं लगाया?मैं इस बात को बिल्कुल नहीं मानती। वास्तव में कांग्रेस ही नहीं चाहती है कि यह बिल पारित हो।
सरकार ने राज्यसभा में बिल पारित कराने में पूरी शिद्दत दिखाई फिर उसकी नीयत पर संदेह क्यों?अगर कांग्रेस की नीयत साफ होती तो यह विधेयक 19 दिसंबर को लोकसभा में पेश होने वाले दिन ही पास हो जाता। सपा सांसद द्वारा बिल छीनने पर केंद्र सरकार की जिम्मेदारी बनती थी कि वह चेयर से आग्रह कर मार्शल का इस्तेमाल कराती और बिल पर वोटिंग कराती। राज्यसभा में महिला आरक्षण बिल के दौरान मार्शल का इस्तेमाल कर वोटिंग कराई गई थी और बिल पारित हुआ था।
कहा जा रहा कि पर्दे के पीछे कांग्रेस और भाजपा के भीतर इस बिल के खिलाफ उठ रही आवाज ने भी इसका रास्ता रोका है?ऐसा होता तो राज्यसभा में बिल कैसे पारित होता।
उत्तर प्रदेश में प्रमोशन में आरक्षण के खिलाफ आंदोलन ने क्या सरकारी तंत्र को बांट दिया है?उत्तर प्रदेश में आरक्षण बिल के खिलाफ आंदोलन में सपा का हाथ है। यूपी को छोड़ कर बाकी राज्यों में यह आंदोलन क्यों नहीं हुआ, क्योंकि सभी को मालूम है कि पदोन्नति में एससी-एसटी आरक्षण पहली बार नहीं है, बल्कि 1955 से है।
क्या आपको लगता है कि यूपीए सरकार ने रिटेल में एफडीआई समेत अपने कई अहम एजेंड़े आपके समर्थन से पूरा कर लिया है? अगर यूपीए सरकार और कांग्रेस ऐसा सोचती है तो यह उनकी बहुत बड़ी भूल है। हमने यूपीए सरकार को सांप्रदायिक ताकतों को रोकने के लिए समर्थन दिया था। साथ ही कांग्रेस ने देश हित और कमजोर वर्ग के हित में नीतियों को लागू करने की बात कही थी। अब बातों पर थोड़ा विश्वास तो करना ही पड़ता है। सरकार साढे़ तीन साल से ज्यादा का वक्त पूरा कर चुकी है मगर हमारी उम्मीद के किसी पैमाने पर खरी नहीं उतरी है। अब बचे सवा साल में हम थोड़ा और मौका देकर इन्हें झेलते हैं कि आखिर अपने वादों पर वे कितने खरे उतरते हैं।
केंद्र में सरकार और सियासत के जो हालात दिख रहे हैं उसमें क्या लोकसभा चुनाव समय पर 2014 में ही होंगे?वर्तमान देश के हालात और सरकार की स्थिति देखकर लोकसभा चुनाव समय पर नहीं, बल्कि उससे पहले 2013 में ही होने के आसार हैं।
कांग्रेस और भाजपा अलग-अलग राजनीतिक चुनौतियों से जूझ रही हैं। ऐसे में क्या आप तीसरे विकल्प की अगुवाई के लिए कोई पहल करेंगी? अभी इस बारे में कुछ कहना मुनासिब नहीं होगा। लोकसभा चुनाव के रिजल्ट आने से पहले मैं कुछ नहीं कह सकती। चुनाव के बाद क्या हालात बनते हैं और कैसी तस्वीर बनती है, यह देखने के बाद ही कुछ कहा जा सकेगा।
मुलायम सिंह यादव ने पीएम पद की दावेदारी को जाहिर करते हुए तीसरे मोर्चे की कुछ शुरुआती पहल की थी। सपा की इस पहल को आप कितना दमदार मानती हैं? यह सवाल तो आप सपा से ही पूछिए।
आपने कहा है कि आप केवल दलित ही नहीं, बल्कि सर्वसमाज की राजनीति करती हैं। आपकी यह सियासत आपको कब तक पीएम की कुर्सी तक ले जाएगी?मुस्कुराते हुए, देखिए यह जनता तय करेगी। केवल दलित ही नहीं, बल्कि देश के सभी वर्गों के कमजोर लोगों को प्राथमिकता में रखना बीएसी की नीति है। जब लोग यह समझ जाएंगे तो निसंदेह मुझे पीएम बनाएंगे।
कानून व्यवस्था को लेकर अखिलेश सरकार पर बसपा का प्रहार क्या राजनीति जल्दबाजी नहीं?बिल्कुल नहीं, उत्तर प्रदेश में सपा की नौ महीने के कार्यकाल में ही कानून व्यवस्था बुरी तरह चरमरा गई है। हत्या, बलात्कार, दलित उत्पीड़न ही नहीं, बल्कि करीब सौ सांप्रदायिक दंगे हो चुके हैं। इतने दिनों में ही डेढ़ हजार से ज्यादा बलात्कार की घटनाएं हो चुकी हैं। यह मैं नहीं कह रही, बल्कि यूपी के लोग कह रहे हैं कि कानून व्यवस्था के मामले में तो बसपा सरकार ही बेहतर थी।
आपकी सरकार के दौरान भी भ्रष्टाचार के काफी आरोप लगाए गए थे?राजनीतिक विद्वेष और स्वार्थ के लिए तो आप चाहे कुछ भी आरोप लगा दें। मगर हकीकत लोगों को मालूम है।
खुद के अनुभव को देखते हुए क्या आप सीबीआई को सरकार के नियंत्रण से स्वतंत्र करने की मांग को सही मानती हैं?यह सच्चाई है कि सीबीआई का राजनीतिक इस्तेमाल होता रहा है। भाजपा ने ताज कॉरीडोर और संपत्ति के मामले में मेरे खिलाफ सीबीआई का इस्तेमाल किया। दूसरी पार्टियां और सरकार भी सीबीआई का इस्तेमाल करती है। मैं इसकी भुक्तभोगी हूं। इसीलिए बीएसपी सीबीआई को स्वायत्त एजेंसी बनाने के पक्ष में है।