लोकसभा चुनावों में पार्टी की शर्मनाक हार को लेकर कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं के निशाने पर सबसे ज्यादा निशाने पर टीम राहुल के वो लोग हैं जिन्हें तमाम दिग्गजों को दरकिनार करके पिछले कुछ वर्षों में आगे बढाया गया और हर तरह की छूट दी गई।
लेकिन अपनी राजनीतिक अनुभवहीनता और अकादमिक अहंकार ने उन्होंने न पार्टी के कार्यकर्ताओं की परवाह की और न ही वरिष्ठ नेताओं की सुनी।
इन नेताओं पर आम कार्यकर्ताओं से दूरी, जमीनी हकीकत की अनदेखी, कांग्रेस के मूल जनाधार की उपेक्षा, गुटबाजी, मनमानी और पैसे के बंदरबांट तक के आरोप लग रहे हैं।
राहुल गांधी की टीम निशाने पर
यह जानकारी देने वाले कांग्रेस नेताओं के मुताबिक पूर्व केंद्रीय मंत्री जयराम रमेश, जितेंद्र सिंह, मिलिंद देवड़ा, जितिन प्रसाद, आरपीएन सिंह, सचिन पायलट, ज्योतिरादित्य सिंधिया, संचार एवं संपर्क विभाग के प्रमुख और महासचिव अजय माकन, पार्टी महासचिव दिग्विजय सिंह, मधुसूदन मिस्त्री, सीपी जोशी,मोहन प्रकाश को पार्टी में राहुल की टीम माना जाता है।
जबकि राहुल के निजी स्टाफ और टीम में उनके सचिव कनिष्क सिंह, सचिन राव, मोहन गोपाल, कौशल विद्यार्थी हैं जिन्हें कांग्रेस उपाध्यक्ष का आंख कान बताया जाता है। पूर्व सांसदों में मीनाक्षी नटराजन, दीपेंद्र हुड्डा, अशोक तंवर, राजीव सातंव, राज बब्बर को भी राहुल के करीबी लोगों में माना जाता है।
रायबरेली और अमेठी लोकसभा क्षेत्र का जनसंपर्क देखने वाले किशोरी लाल शर्मा और मनोज मट्टू भी राहुल की भीतरी टीम का हिस्सा हैं। शर्मा कांग्रेस सचिव भी हैं और बिहार के सह प्रभारी हैं। लेकिन सबसे ज्यादा निशाने पर टीम राहुल के गैर राजनीतिक और कार्पोरेट संस्कृति वाले लोग हैं जिन्होंने राहुल गांधी को आम कार्यकर्ताओं, वरिष्ठ नेताओं और कांग्रेस हितैषियों से दूर रखा।
राहुल से कहां हुई गलती?
कांग्रेस सूत्रों के मुताबिक 2009 के लोकसभा चुनावों के बाद पिछले जितने भी विधानसभा हुए उनमें राहुल की यही टीम प्रभावी रही और 2014 के लोकसभा चुनावों में भी इसी टीम राहुल का दबदबा रहा।
हालाकि कांग्रेस केवरिष्ठ नेताओं में कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के राजनीतिक सचिव अहमद पटेल ने भी पार्टी के कई प्रमुख फैसलों को प्रभावित किया जबकि अन्य वरिष्ठ नेताओं ए.के.एंटनी, मोतीलाल वोरा, जनार्दन द्विवेदी, अंबिका सोनी, गुलाम नबी आजाद, मोहसिना किदवई, सत्यव्रत चतुर्वेदी, सुरेश पचौरी, शकील अहमद की भूमिका सिर्फ सलाह देने तक ही सिमट गई थी।
जबकि सरकार के भीतर पी. चिदंबरम, कपिल सिब्बल, सलमान खुर्शीद, मनीष तिवारी, आनंद शर्मा, कमलनाथ सबसे ज्यादा प्रभावी रहे।
कांग्रेस कार्यकर्ताओं में रोष
कांग्रेस कार्यकर्ताओं में इनको लेकर जबर्दस्त आक्रोश है। टीम राहुल ने जिस तरह कमरों में बैठकर चुनावी रणनीति बनाई। राहुल गांधी केअप्रभावी भाषण तैयार किए। सिर के ऊपर से निकल जाने वाले नारे गढ़े गए और प्रचार अभियान में जिस तरह लूट और बंदरबांट हुई, इसे लेकर पार्टी केभीतर कई तरह की चर्चाएं गर्म हैं।
बड़े जोर शोर से जिस जापानी कंपनी को 500 करोड़ रुपए के लंबे चौड़े बजट के साथ राहुल की छवि निर्माण और प्रचार का काम सौंपा गया था, वह भी बीच में ही काम छोड़कर भाग गई। गुरुद्वारा रकाबगंज रोड पर बने कांग्रेस वॉर रूम ने जिस तरह चुनाव पूरा होने से पहले ही मैदान छोड़ दिया, इसे लेकर भी वरिष्ठ नेताओं में जबर्दस्त नाराजगी है।
किसके नेता बन कर रह गए राहुल?
यूपीए सरकार की उपलब्धियों को राजनीतिक एजेंडा न बनाकर महज सरकारी विज्ञप्तियों की तरह प्रचारित किया गया।
किसानों के लिए यूपीए सरकार ने इतना काम किया, लेकिन राहुल के रणनीतिकारों ने उन्हें किसानों के नेता के रूप में स्थापित करने की कोई प्रभावी योजना नहीं बनाई। हरियाणा में हुई एक किसान पंचायत को ही पर्याप्त मान लिया गया।
जबकि सुझाव यह था कि चुनाव से करीब एक डेढ़ साल पहले जब दिल्ली में सफल किसान रैली हुई थी, उसके बाद देश भर में राहुल की किसान रैलियां की जानी चाहिए थीं।
नरेंद्र मोदी और केजरीवाल से रही टक्कर
टीम राहुल का ज्यादा जोर राहुल को युवा नेता के रूप में प्रचारित करने का रहा जबकि युवकों खासकर शहरी युवाओं के बीच नरेंद्र मोदी और अरविंद केजरीवाल पहले ही पैठ बना चुके थे। राहुल के नीरस भाषणों में जिस तरह स्थानीय मुद्दों, देशज भाषा और सियासी जुमलों का अभाव था, उसे लेकर भी टीम राहुल निशाने पर है।
फिर बिहार, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान के विधानसभआ चुनावों में राहुल के रणनीतिकारों ने कांग्रेस के सवर्ण विशेषकर ब्राह्मण और मुस्लिम जनाधार की उपेक्षा करके पिछड़ों को इस हद तक तरजीह दी गई जो ब्राह्मण विरोध की सीमा तक पहुंच गई, उससे भी कांग्रेस का यह जनाधार भाजपा के साथ चला गया।