समुद्र तट पर बसा यह पर्यटक शहर भाजपा में अटल-आडवाणी युग के अंत का गवाह बन गया। मुरली मनोहर जोशी को छोड़ दें तो अब भाजपा की पूरी कमान नई पीढ़ी के हाथ आ गई है।
अब 2014 के लोकसभा की सियासी जंग में भाजपा को चुनावी वैतरणी पार लगाने के लिए मोदी-राजनाथ की जोड़ी सामने है।
नरेंद्र मोदी को पार्टी के नए चेहरे के तौर पर पेश करने के बाद अब भाजपा पूरी तरह से अटल-आडवाणी की छाया से बाहर निकल गई है। अटल बिहारी वाजपेयी लंबे समय से अस्वस्थ चल रहे हैं, लेकिन 85 वर्षीय लालकृष्ण आडवाणी अब भी पूरी तरह से सक्रिय हैं।
पिछली बार लोकसभा चुनाव में भाजपा समेत एनडीए ने उन्हें पार्टी के चेहरे के तौर पर पेश किया था, लेकिन पार्टी चुनाव हार गई। संसद में आडवाणी भाजपा संसदीय दल के अध्यक्ष हैं, लेकिन मोदी को आगे कर देने से अब यह पद अलंकरण मात्र रह गया है।
वैसे तो मोहम्मद अली जिना प्रकरण के बाद से आडवाणी संगठन के दैनिक कामकाज से दूर ही रहते हैं, लेकिन मोदी प्रकरण से यह संदेश चला गया है कि वे नई पीढ़ी को कमान सौंपने के पक्ष में नहीं हैं।
दूसरी ओर, भाजपा संगठन को चला रहे ज्यादातर नेता 65 साल से कम उम्र के हैं। पार्टी अध्यक्ष राजनाथ की टीम में भी 80 फीसदी नेता 60 साल की उम्र के हैं।
भाजपा की अग्रिम पंक्ति के नेताओं में अब आडवाणी और जोशी ही उम्र दराज हैं। राजनाथ के साथ ही सुषमा स्वराज, अरुण जेटली, वेंकैया नायडू, अनंत कुमार से लेकर पार्टी शासित प्रदेशों के मुख्यमंत्री को अटल-आडवाणी के बाद की पीढ़ी माना जाता है।
भाजपा भी मानने लगी है कि आडवाणी युग का अंत हो चुका है। इसका साफ संकेत दे दिया गया है। पार्टी प्रवक्ता शाहनवाज हुसैन ने कहा है कि भाजपा का सौभाग्य है कि उसके पास अटल-आडवाणी जैसे नेता हैं।
उन्होंने कहा कि आडवाणी जी आगे भी आशीर्वाद देते रहेंगे। वे भाजपा के शिल्पकार हैं और उन्होंने भाजपा को गढ़ा है। कांग्रेस को सत्ता से बेदखल करने में पहले भी उनका बढ़ा योगदान रहा है और आगे भी वे भाजपा की मदद करते रहेंगे।
वाजपेयी-आडवाणी युग का अंत
2014 आम चुनावों के लिए मोदी द्वारा कमान संभालने के साथ ही भाजपा में वाजपेयी-आडवाणी युग का अंत हो गया। दोनों नेताओं ने 1951 में स्थापित भारतीय जन संघ से अपने राष्ट्रवादी राजनीतिक कैरियर की शुरुआत की थी। भाजपा में दोनों साथ-साथ बढ़े।
2005 में अटल बिहारी वाजपेयी ने सक्रिय राजनीति से संन्यास की घोषणा की। जबकि आडवाणी के नेतृत्व में भाजपा ने 2009 में लोकसभा चुनाव लड़ा, मगर हार गई। आगामी आम चुनाव में भाजपा कैडर शिद्दत से नए चेहरे की जरूरत महसूस कर रहा था।
मोदी की लोकप्रियता में उसे अपनी जीत सुनिश्चित दिख रही है। चुनाव अभियान समिति के अध्यक्ष के रूप में मोदी के उदय के साथ ही तय हो गया कि अब भाजपा वाजपेयी-आडवाणी को पीछे छोड़ आगे बढ़ चुकी है।