विधानसभा चुनाव के सप्ताह भर बाद भी महाराष्ट्र में सरकार का गठन नहीं हो सका है। महाराष्ट्र भाजपा विधायक दल की बैठक मंगलवार को बुलाई गई है। बैठक में विधायक दल के नेता का चुनाव किया जाएगा और उसके बाद पार्टी सरकार बनाने के लिए औपचारिक दावा पेश करेगी।
भाजपा और शिवसेना के बीच अंदरखाने में नए सिरे से गठबंधन के लिए बातचीत चल रही है। शिवसेना ने सोमवार को अपने मुखपत्र 'सामना' के जरिए कहा है कि नीतिन गडकरी हों या देवेंद्र फड़नवीस, पार्टी उस नेता का समर्थन करेंगी, जो महाराष्ट्र का विकास करेगा।
भाजपा की स्थानीय इकाई के कई नेताओं ने भी शिवसेना से सहयोग की इच्छा जताई है। हालांकि, दोनों दलों के शीर्ष नेतृत्व का रवैया 'कभी-नरम-कभी-गरम' ही रहा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और शिवसेना प्रमुख उद्घव ठाकरे के बीच समझौत होने के संकेत भी नहीं हैं।
ऐसे में यह कह पाना कि भाजपा और शिवसेना का गठबंधन हो पाएगा, अब भी मुश्किल है। कम से कम उद्घव और मोदी के रिश्तों की कड़वाहट ऐसी है कि उसे मधुर होने में वक्त लगना तय है।
..तब मोदी के बाप को दी थी चुनौती!
पिछले सप्ताह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन के सांसदों को चाय पार्टी दी थी। उम्मीद थी कि चाय पार्टी में शिवसेना सुप्रीमो उद्घव ठाकरे भी शामिल होंगे। लेकिन वे शामिल नहीं हुए।
विधानसभा चुनावों में कई बार ऐसे मौके आए जब उद्घव ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर तगड़ा हमला किया। पार्टी के मुखपत्र सामना में लिखे आलेखों में उन्होंने मोदी पर व्यक्तिगत हमले भी किए।
सामना में लिखे एक आलेख में उन्होंने कहा कि महाराष्ट्र में शिवसेना के बगैर नरेंद्र मोदी के बाप भी चुनाव नहीं जीत सकते।
उद्घव ने लिखा की शिवसेना की मदद से ही लोकसभा चुनावों में भाजपा ने बहुमत पाया था, यदि शिवसेना न होती तो नरेंद्र मोदी के पिता दामोदरदास मोदी भी महारष्ट्र में नहीं जीत पाते, भाजपा की बात ही क्या है!
उद्घव का मोदी विरोधी रवैया नया नहीं
मोदी के खिलाफ उद्घव का ये रवैया विधानसभा चुनाव या भाजपा के साथ गठबंधन टूटने के बाद रहा हो,ऐसा भी नहीं है। लोकसभा चुनावों से बहुत पहले ही उद्घव ठाकरे का रवैया मोदी विरोधी ही रहा।
लोकसभा चुनावों से तकरीबन साल भर पहले जब भाजपा में प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार के लिए जद्दोजहद हो रही थी, उस समय उद्घव ने कहा था कि बाला साहेब ठाकरे की इच्छा थी कि राजग की ओर से प्रधानमंत्री पद की उम्मीदवार सुषमा स्वराज बनें। नरेंद्र मोदी उस समय प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवारों में सबसे आगे थे।
उद्घव का मोदी विरोधी रवैया लोकसभा चुनाव प्रचार के दौरान भी दिखाई थी। लोकसभा चुनावों में मोदी ने जब मुंबई में रैली की थी, उस समय उद्घव ठाकरे ने उनसे मुलाकात करने से इनकार कर दिया था।
असंभव नहीं मोदी और उद्घव की दोस्ती भी!
उस समय उद्घव ने कहा था कि मोदी प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार हैं। प्रधानमंत्री नहीं हैं। उन्हें मुझसे मिलना हैं तो वे मातोश्री आएं।
उल्लेखनीय है कि भाजपा की ओर से प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार चुने जाने के बाद राजग के अन्य घटक दलों ने भी मोदी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार मान लिया था। उन्हीं के नेतृत्व में चुनाव लड़ा गया। इसके बाद मोदी को लेकर उद्घव का रवैया अड़ियल ही बना रहा।
विधानसभा चुनाव के नतीजे आने के बाद उद्घव ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को फोन करके बधाई दी थी। जिसके बाद ये कयास लगाया गया था कि दोनों नेताओं के रिश्तों पर जमीं बर्फ पिघल रही है।
हालांकि नतीजे आए सप्ताह भी से अधिक हो गए हैं। मोदी और उद्घव के मुलाकात की खबरें भी कई बार आई, लेकिन न दोनों नेताओं की मुलाकात हो सकी है और न गठबंधन।
वैसे राजनीति में कुछ भी असंभव नहीं होता। मोदी और उद्घव की दोस्ती भी संभव है।