संकट से घिरे पार्टी अध्यक्ष नितिन गडकरी के साथ खड़ी भाजपा इस प्रकरण पर सधी और सीधी नजर रखे हुए है। पार्टी अभी तो ‘देखो और इंतजार करो’ की नीति पर चल रही है। अपने अध्यक्ष के बचाव में मैदान में उतरी भाजपा ने कांग्रेस पर पलटवार करते हुए चुनौती दी है कि गडकरी की तरह वह भी राबर्ट वाड्रा, टूजी, कोलगेट समेत भ्रष्टाचार के मामलों में जनता के सामने जबाव देने की हिम्मत करे। वैसे देखा जाए तो पार्टी के अंदर दबी जुबान यह चर्चा तेज हो गई है कि व्यवसाय से जुड़े लोगों को शीर्ष स्तर पर लाना राजनीतिक समझदारी है या नहीं।
गडकरी ने हालांकि खुद ही जांच की मांग कर अपने को पाक-साफ दिखाने की कोशिश की है, लेकिन पार्टी नेताओं को डर है कि आगामी चुनावों में भ्रष्टाचार के खिलाफ पार्टी का अभियान ध्वस्त हो सकता है। सरकार भी गडकरी के पीछे पड़ गई है। कंपनी मामलों के मंत्रालय के बाद आयकर विभाग ने उनकी कंपनियों में हुए गड़बड़झाले की जांच शुरू कर दी है। इस पर लोकसभा में विपक्ष की नेता सुषमा स्वराज ने कहा कि वे खुद ही जांच के लिए तैयार हैं। इधर, गडकरी ने नागपुर से दिल्ली लौटने की योजना टाल दी है। अब वे सीधे चुनाव प्रचार के लिए हिमाचल प्रदेश जाएंगे।
गडकरी के खिलाफ लग रहे आरोपों को कानूनी कसौटी पर कसने के बाद भाजपा के वरिष्ठ नेताओं लालकृष्ण आडवाणी और अरुण जेटली ने गडकरी का बचाव तो किया, लेकिन पार्टी के कई अन्य नेता उन्हें लेकर आश्वस्त नहीं हैं। गौरतलब है कि आडवाणी ने भी अपने बयान में स्पष्ट कर दिया था कि आरोपों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। इतना तो साबित हो ही चुका है कि व्यवसाय के मानदंड पर गडकरी की पूर्ति पावर एंड शुगर कंपनी खरी नहीं उतरी है।
संघ के पसंदीदा गडकरी की ताजपोशी के वक्त भी दिल्ली में एक खेमा इस फैसले से संतुष्ट नहीं था। खासतौर पर केंद्रीय राजनीति में उनके अनुभव की कमी को लेकर आशंका थी। भ्रष्टाचार के खिलाफ अरविंद केजरीवाल का पोल खोल अभियान शुरू हुआ तो उन नेताओं को यह डर सता रहा था कि व्यावसायिक हितों के कारण गडकरी सबसे नरम शिकार बन सकते हैं। अब जबकि पहला हमला हो चुका है तो यह आशंका और तेज हो गई है। उनका मानना है कि भविष्य में कोई बड़ा आरोप लगा तो भाजपा की बुनियाद ही हिल जाएगी।
हिमाचल प्रदेश में चुनाव प्रचार जोरों पर है। दिसंबर में गुजरात में भी चुनाव होना है। नवंबर से शुरू होने वाले संसद के शीतकालीन सत्र में भी पार्टी को गडकरी के खिलाफ आरोपों से लगातार जूझना पड़ेगा। ऐसे में ये नेता गडकरी को बतौर अध्यक्ष दूसरा कार्यकाल देने के पक्ष में नहीं हैं। शायद यही कारण है कि संघ भी थोड़ा रुककर निर्णय लेगा। माना जा रहा है कि मुंबई और पुणे में गडकरी के खिलाफ शुरू हुई सरकारी विभागों की जांच की आंच देखने के बाद ही कोई फैसला होगा।