राजनीति एक ऐसी जगह है, जहां अलग-अलग क्षेत्रों से आने वाले लोगों के लिए जगह बन ही जाती है।
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खिलाड़ी हो, अभिनेता हों, गायक, पत्रकार या फिर उद्योगपति, राजनीतिक दल जरूरत के मुताबिक सभी को अपना लेते हैं। लेकिन राजनीति में एंट्री जितनी आसान है, यहां चल या टिक पाना उतना मुश्किल।
आज हम जिक्र कर रहे हैं कि ऐसे लोकसभा प्रत्याशी का, जिसकी शुरूआत एक साधु के रूप में हुई। पूर्वी दिल्ली से भाजपा के लोकसभा प्रत्याशी महेश गिरि। लोकसभा के लिए घोषित दिल्ली भाजपा के सारे बड़े नामों के बीच महेश गिरि ऐसा नाम है, जो एकदम अलग और अनजान है।
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भाजपा के इस लोकसभा प्रत्याशी की कहानी जितनी चौंकाने वाली है, उतनी ही दिलचस्प है। 17 साल की उम्र में घर छोड़ने वाला एक युवक आज भाजपा के घर में कैसे पहुंच गया, पढ़िए दिलचस्प कहानी।
साधु से सियासत तक का सफर
नासिक के ब्राह्मण परिवार में जन्मे महेश गिरि 17 साल की उम्र में ही घर से निकल गए। महेश गिरी के मुताबिक वह तीन साल हिमालय में रहे। यहां वक्त गुजारने के बाद वह अपने गुरु की तलाश में गुजरात के गिर पहुंचे।
वहां उनकी मुलाकात गुजरात के गिरनार की गुरु श्री दत्तात्रेय पीठ के प्रमुख से हुई। 25 साल की कम उम्र में ही महेश गिरि श्री दत्तात्रेय पीठ के पीठाधीश बने। आज दत्तात्रेय पीठ के लाखों की संख्या में अनुयायी हैं और ज्यादातर उस पीठ को मानने वाले नगा साधु हैं।
कई साल गिरनार के गुरु श्री दत्तात्रेय पीठ के पीठाधीश रहने के दौरान ही उनकी मुलाकात जाने माने आध्यात्मिक गुरु श्री श्री रविशंकर से एक सार्वजनिक कार्यक्रम के दौरान हुई। श्री श्री रविशंकर वक्ता के तौर पर महेश गिरि से काफी प्रभावित हुए।
श्री श्री रविशंकर से क्या है कनेक्शन?
साल 2002 में महेश गिरि से प्रभावित आध्यात्मिक गुरु श्री श्री रविशंकर ने उन्हें आर्ट ऑफ लिविंग संस्थान से जुड़ने का निवेदन किया। श्री दत्तात्रेय पीठ के पीठाधीश का पद त्यागकर वह आर्ट आफ लिविंग के साथ जुड़े़।
इस दौरान वह संजीवनी यात्रा, बेटी बचाओ, मेरी यमुना मेरी दिल्ली, अमरनाथ भूमि जैसे आंदोलनों से जुड़े। आर्ट ऑफ लिविंग के साथ रहते हुए वह संस्था के इंटरनेशनल डायरेक्टर बने।
इसी दौरान यूपीए सरकार के भ्रष्टाचार के खिलाफ खड़े इंडिया अगेंस्ट करप्शन मूवमेंट के संस्थापक सदस्य के तौर पर जुड़े रहे। यह वही मूवमेंट है, जो आगे चलकर अन्ना आंदोलन और आज आम आदमी पार्टी में बदल गया।
2013 से ही शुरू की चुनावी तैयारियां
सूत्रों के मुताबिक महेश गिरि को 2013 से ही भाजपा की ओर से लोकसभा की टिकट मिलने का इशारा मिल गया था। इसी योजना के तहत उन्होंने इलाके में धुआंधार प्रचार अभियान शुरू किया।
पहले आर्ट्स ऑफ लिविंग के जरिए उन्होंने झुग्गी-झोपड़ियों से लेकर हर वर्ग तक अपनी पहुंच बनाई। उन्होंने इस दौरान कई मेडिकल कैंप आयोजित किए। इसके बाद महेश गिरि औपचारिक तौर पर आर्ट्स ऑफ लिविंग से अक्टूबर 2013 में इस्तीफा देकर भाजपा के साथ जुड़ गए।
योजनाबद्ध तरीके से भाजपा के पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन गडकरी और विधानसभा चुनावों में मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार रहे डॉ हर्षवर्धन की मौजूदगी में भाजपा की सदस्य बने। सूत्रों के मुताबिक इस सदस्यता कार्यक्रम के दौरान ही उनका टिकट मिलने का रास्ता साफ हो गया था।
साधु-संतों के बीच मजबूत पकड़
ऐसा कहा जाता है कि साधु-संतों में अपनी पकड़ रखने वाली भाजपा में दरअसल महेश गिरि की एंट्री आध्यात्मिक गुरु श्री श्री रविशंकर के कहने पर ही हुई।
उन्हीं के आदेश पर भाजपा हाईकमान ने महेश गिरि को पूर्वी दिल्ली से कई उम्मीदवारों को दरकिनार करते हुए लोकसभा का प्रत्याशी बनाया गया। भाजपा से पहले ही श्री श्री रविशंकर जी की नजदीकियां जगजाहिर रही हैं।
अन्ना आंदोलन से लेकर रामदेव आंदोलन तक रविशंकर हमेशा सक्रिय भूमिका निभाते आए हैं। लाखों अनुयायियों के कारण भाजपा भी उनका लोकसभा चुनावों में फायदा उठाना चाहती है।
श्री श्री रविशंकर की शहरी इलाकों में रहने वाले मध्यम और उच्च-मध्यम परिवार में अच्छी-खासी पकड़ है। इसलिए टिकट की राह आसान होते ही महेश गिरि चुनाव प्रचार में जुट गए। महेश गिरि ने प्रचार के दौरान सबसे पहले झुग्गी झोपड़ियों में अपनी पकड़ बनाने के लिए यात्राएं शुरू कीं।
जिस लोकसभा सीट से भाजपा ने महेश गिरि को टिकट दिया उस सीट पर दिल्ली की पूर्व मुख्यमंत्री शीला दीक्षित के बेटे संदीप दीक्षित सांसद हैं।
इस बार भी कांग्रेस ने संदीप दीक्षिप पर दांव खेला है। सवाल है कि भाजपा का ये योगी क्या संदीप दीक्षित जैसे मजबूत प्रतिद्वंदी को हरा पाएगा?
साथ ही विधानसभा चुनावों में देखने को मिली आम आदमी पार्टी की लहर इस सीट पर कितना प्रभाव डालती है ये भी महत्वपूर्ण होगा। आम आदमी पार्टी ने भी बड़ा दांव खेलते हुए महात्मा गांधी के पौत्र राजमोहन गांधी को पूर्वी दिल्ली से टिकट दिया है।
अरविंद केजरीवाल की पार्टी भी लोकसभा चुनावों में कांग्रेस और भाजपा दोनों को कड़ी टक्कर देने के मूड मे है। फिलहाल इस सीट पर मुकाबला त्रिकोणीय हैं और देखने लायक होगा कि भाजपा का ये अनजान चेहरा क्या बड़े-बड़े नामों को शिकस्त दे पाएगा?