आम आदमी पार्टी पर चंदा लेने में फर्जीवाड़े और काले धन को सफेद बनाए जाने के आरोप के बाद राजनीतिक दलों को मिलने वाले राजनीतिक चंदे को लेकर बहस शुरू हो गई।
भाजपा, कांग्रेस, बसपा और सपा समेत देश की ज्यादातर राजनीतिक दल नगदी में चंदा लेती हैं जबकि चेक से चंदा लेने के मामले मात्र 20 फीसदी ही हैं। इसका खुलासा वित्त मंत्रालय को सौंपी गई काले धन पर 1000 पेज की आंतरिक रिपोर्ट में भी किया गया है।
इसमें कहा गया है कि ज्यादातर बड़ी पार्टियां 75 से 100 फीसदी तक चंदा नगद में लेती हैं और यह राशि 20 हजार रुपये से कम होती है। इसकी वजह यह है कि इतनी या इससे कम राशि देने वाले की जानकारी देना अनिवार्य नहीं है और यही कानूनी खामी काले धन को खपाने का एक बड़ा जरिया है।
800 करोड़ रुपए नगद लिया चंदा
मान लीजिए, यदि भाजपा या कांग्रेस राजनीतिक चंदे के रूप में 1000 करोड़ रुपये लेती हैं तो इसमें से मात्र 200 करोड़ रुपये ही चेक द्वारा लेना दिखाया जाएगा और 800 करोड़ रुपयों को नगद के रूप में दिखाया जाएगा।
मौजूदा दोषपूर्ण कानून के अनुसार, राजनीतिक दलों द्वारा चंदे के रूप में लिए गए 80 फीसदी फंड का कोई हिसाब किताब नहीं है क्योंकि कानून कहता है कि चंदे के तौर पर 20 हजार रुपये से कम की राशि देने वाले व्यक्ति की जानकारी देना जरूरी नहीं है।
इसका फायदा उठाने के लिए मायावती की बसपा अपने 100 फीसदी फंड को नगद के तौर पर दिखाती है और लाखों लोगों द्वारा 20 हजार रुपये से कम की रकम दिए जाने की बात कहती है। वित्त मंत्री अरुण जेटली को सौंपी गई काले धन पर रिपोर्ट में कहा गया है कि कानून का यह नियम काले धन को खपाने या छिपाने का एक बड़ा जरिया है।
काला धन या फिर खरा पैसा
स्थापित राजनीतिक पार्टियां इसी खामी का फायदा उठाकर नगद चंदा देने वाली कंपनियों और लोगों की पहचान गुप्त रखती हैं। यदि आम आदमी पार्टी की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई पर हामी भरी तो यह असली मुद्दा होगा।
आप ने अपनी याचिका में चेक या नगदी के तौर पर मिलने वाले राजनीतिक चंदे की जानकारी सार्वजनिक किए जाने को अनिवार्य बनाने की अपील की है। वित्त मंत्री जेटली ने मंगलवार को सवाल उठाया था कि आखिर आप नेताओं ने 50-50 लाख का चेक देने वाली कंपनियों की पृष्ठभूमि की जांच क्यों नहीं की।
हालांकि सरकारी जांच एजेंसियों को बड़े राजनीतिक चंदों की भी जांच करनी चाहिए। काले धन पर सौंपी गई रिपोर्ट में कहा गया है कि कांग्रेस अपने चंदे का 88 फीसदी जबकि भाजपा 77 फीसदी नगदी के रूप में लेती है और यह चंदा 20 हजार रुपये से कम का होता है। ऐसे में यह विश्वास करना काफी मुश्किल है कि इतनी बड़ी राशि काला धन न होकर सही पैसा होगा।