मात्र सवा साल के राजनैतिक करियर में बड़े-बड़े राजनैतिक दांवपेंच दिखाने वाली आम आदमी पार्टी ने जनलोकपाल बिल के मुद्दे पर इस्तीफे की धमकी देकर राजधानी की राजनीति में भूचाल ला दिया है।
इसको लेकर भाजपा और कांग्रेस के रणनीतिकार मौजूदा स्थिति को देखते हुए गुणा-भाग में जुटे हुए हैं। सूत्रों के अनुसार केजरीवाल की सरकार लोकसभा चुनाव तक चलती रहे, इसे ही दोनों दल अपने लिए राजनैतिक फायदा मान रहे हैं।
दिल्ली पुलिस के अधिकारियों पर कार्रवाई की मांग के चलते मुख्यमंत्री के धरने पर बैठने को लेकर जनता की तरफ से मिलीजुली प्रतिक्रिया आई थी। कहीं न कहीं सरकार के इस धरने पर केजरीवाल को ज्यादा सफाई जनता के बीच देनी पड़ी।
लोकसभा चुनाव में फायदे के लिए खेला दांव
पार्टी सूत्रों के अनुसार अब ‘आप’ ने जनलोकपाल बिल पास नहीं होने पर इस्तीफे का दांव खेलकर डैमेज कंट्रोल के अलावा सत्ता की शहादत के रास्ते इसे आगामी चुनावों में भुनाने का दांव खेला है।
वहीं, केजरीवाल के इस दांव पर भाजपा और कांग्रेस हैरान-परेशान भी हैं। विधानसभा में विपक्ष के नेता डॉ. हर्षवर्धन भाजपा विधायकों के साथ सोमवार को राष्ट्रपति से मिलने पहुंचे तो जनलोकपाल बिल और केजरीवाल के इस्तीफे पर कुछ नहीं बोले।
भाजपा सूत्रों की माने तो ‘आप’ के इस कदम के बाद पार्टी के पीएम इन वेटिंग के रास्ते में कोई रुकावट न आए, इसको लेकर मंथन किया गया।
जिसके बाद जनलोकपाल बिल का कोई विरोध हर्षवर्धन ने नहीं किया, जबकि इसके समर्थन पर वे नरम दिखे।
भाजपा कर सकती है जनलोकपाल का समर्थन
सूत्र यह भी बताते हैं कि कांग्रेस अगर जनलोकपाल बिल के पक्ष में वोट नहीं करती है तो भाजपा इसका समर्थन कर सकती है।
दूसरी ओर कांग्रेस पहले की तरह ही वेट एंड वॉच की पॉलिसी अपनाए हुए है। हालांकि वह पहले जनलोकपाल बिल को समर्थन नहीं देने की बात कह चुकी है, लेकिन अब उसका मानना है कि मोदी को रोकने के लिए जरूरी है कि ‘आप’ की सरकार लोकसभा चुनाव तक कायम रहे।
ऐसे में सरकार के हटने पर अगर लोकसभा चुनाव के साथ विधानसभा चुनाव भी कराने की स्थिति बन जाती है तो कांग्रेस को और ज्यादा नुकसान होगा।
इसीलिए कांग्रेस और भाजपा दोनों की कोशिश होगी कि लोकसभा चुनाव तक सरकार के इस्तीफा देने की स्थिति न आने दी जाए। यही कारण है कि 16 फरवरी को इस बिल की मंजूरी को लेकर राजधानी में राजनैतिक भूचाल आया हुआ है।
‘केंद्र की अनुमति बिना बिल मंजूर होना मुश्किल’
विधानसभा के सचिव के पद पर चार मुख्यमंत्रियों के साथ काम कर चुके व लोकसभा सचिव के पद से सेवानिवृत एसके शर्मा का कहना है कि इस विधेयक में धन का इस्तेमाल होने और केंद्र सरकार के विभाग इसमें शामिल होने के कारण इसकी केंद्र से स्वीकृति आवश्यक है।
दिल्ली में केंद्र का लोकपाल बिल और लोकायुक्त बिल भी लागू है। ऐसे में जनलोकपाल बिल आने से एक ही काम को करने के तीन-तीन माध्यम होंगे और कई चीजें क्लैश होंगी।
जैसे आईएएस और आईपीएस के खिलाफ जांच केंद्र के लोकपाल बिल में भी है और दिल्ली के जनलोकपाल बिल में भी।
अगर विधानसभा या ओपन सेशन में बिल पास भी हो जाता है तो शायद ही राष्ट्रपति इसे केंद्र की सहमति के बिना पास करेंगे। केंद्र के कानून विभाग को इस बिल पर आपत्ति होना लाजमी है।