फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

बिहार नतीजों से 2019 के लिए मिला नया पॉलिटिकल डीएनए

विज्ञापन
विज्ञापन
वर्ष 2014 की 16 मई को जिस सियासी सुनामी ने देश को बहा दिया था, 8 नवंबर 2016 को वह सुनामी बिहार के चुनाव नतीजों के साथ अब पूरी तरह थम गई है।
विज्ञापन


राष्ट्रव्यापी सियासी सुनामी के चमकते सितारे बनकर उभरे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह के सामने अब आगे चुनौतियों की लंबी फेहरिस्त है।

दिल्ली के बाद बिहार के चुनाव नतीजों से साफ है कि मोदी लहर की सुनामी का दौर खत्म हो चुका है। अब केंद्र की सत्ता में काबिज भाजपा के लिए कदम-कदम पर इम्तिहान है।
विज्ञापन


यह इम्तिहान क्षेत्रीय ही नहीं राष्ट्रीय भी होगा क्योंकि राष्ट्रीय फलक पर पॉलिटिकल डीएनए को एक नई परिभाषा मिल गई है। मोदी के मुकाबले 2019 के लिए योद्धा तलाश रहे विपक्ष को नीतीश के रूप में इस नई परिभाषा का चेहरा सामने नजर आने लगा है।

ऐसा चेहरा जो कद्दावर होने के साथ साथ विकासपरक, उदारवादी और शालीन भी है। महज 44 सीटों और राहुल गांधी की नेतृत्व क्षमता को लेकर उठते सवालों के बीच अस्तित्व बचाने की चुनौती से जूझ रही कांग्रेस के लिए भी संयुक्त विपक्ष के चेहरे के रूप में नीतीश के उदय को अनदेखा करना आसान नहीं होगा।

यूपी, बिहार, पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना में बिल्कुल हाशिए पर जा चुकी कांग्रेस के लिए बड़ी पार्टी होने का दम भरना आसान नहीं है। खासकर बिहार में लालू-नीतीश के कंधे पर सवार होकर 27 सीटें जीतने के बाद तो कांग्रेस इसकी अहमियत ज्यादा समझेगी।

विज्ञापन

बिहार में मात से बढ़ी मोदी-शाह की चुनौती

वैसे भी पीएम मोदी के खिलाफ विपक्ष को जिस चेहरे की तलाश है, नीतीश उस खांचे में फिट बैठ रहे हैं। इसमें पिछड़े वर्ग के साथ प्रगतिवादी राजनीति के हिमायती मुख्यमंत्री के रूप में लंबी पारी का अनुभव भी उनके दावे को मजबूत करेगा।

खुद नीतीश कुमार ने भी जीत के बाद पहली प्रेस कांफ्रेंस में इसके लिए तैयार होने का यह कहते हुए संकेत दिया कि बिहार के नतीजे से साफ है लोग राष्ट्रीय स्तर पर सशक्त विकल्प चाहते हैं।

इसलिए परिणामों का राष्ट्रीय महत्व है और राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य में बिहार अपनी भूमिका को समझता है। तृणमूल कांग्रेस, बीजद, एआईएडीएमके, टीआरएस, अरविंद केजरीवाल, वाम दलों के मुखिया ने आगे बढ़कर जिस प्रकार नीतीश को बधाई दी है, उससे भावी राजनीति के संकेत साफ छिपे हुए हैं।

महत्वपूर्ण यह है कि नीतीश को बधाई देने वालों में राजग के घटक दल शिवसेना, अकाली दल और टीडीपी भी शामिल हैं, जिनके सियासी रिश्ते भाजपा के साथ कड़वे होते जा रहे हैं।

मोदी और शाह के लिए 2019 की चुनौती बेशक अभी दूर है मगर तत्काल की चुनौतियां भी कम छोटी नहीं है। भूमि अधिग्रहण कानून पर मात खा चुकी सरकार के लिए आर्थिक सुधारों से जुड़े बिलों को पारित कराना आसान नहीं होगा।

खासकर यह देखते हुए कि पीएम और विपक्ष के बीच संवाद की सहजता नहीं रही है। संसद विशेषकर राज्यसभा में विपक्ष की ताकत से जूझने के अलावा भाजपा के शिखर नेतृत्व के लिए पार्टी के उन लोगों की आवाज को अनसुना करना मुश्किल होगा जो खुद को हाशिए पर मान रहे हैं।

दिल्ली की हार को तुक्का मान कर समीक्षा से बचने वाले भाजपा नेतृत्व के लिए बिहार में हार का जवाब देना आसान नहीं होगा। दिल्ली और बिहार दोनों जगह भाजपा का आक्रामक प्रचार अभियान उल्टा पड़ता दिखा है क्योंकि दोनों जगह चुनाव अभियान में शुरुआती माहौल बनाने के बाद पार्टी बुरी तरह हारी है।

ऐसे में पार्टी के चुनाव प्रबंधन रणनीतिकारों पर भी बड़ा सवाल उठेगा। लहर के दौर पर लगे विराम के बाद संघ परिवार का दबाव भी भाजपा नेतृत्व पर अपेक्षाकृत ज्यादा हो सकता है। ऐसे में सरकार के लिए अंदरूनी चुनौतियां बढ़ेंगी।

खासकर 16 महीने बाद होने वाले उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव को लेकर पार्टी की उम्मीदों पर भी इसका असर होगा। अगले साल पश्चिम बंगाल के चुनाव में भी ममता बनर्जी को चुनौती देना ज्यादा दुरूह होगा तो असम में पहली बार भाजपा के सत्ता में आने के सपने पर पार्टी को सचेत होना होगा।
और पढ़ें...
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें