देश के पिछड़े राज्यों में से एक बिहार के सहरसा और विकसित राज्य पंजाब के अमृतसर में एक रिश्ता बनाती है जनसेवा एक्सप्रेस।
केवल जनरल बोगियों वाली इस ट्रेन में बिहार के राज-मिस्त्री, मज़दूर, रेहड़ी लगाने और रिक्शा खींचने वाले मेहनतकश लोग ही सफ़र करते हैं।
यह ट्रेन पंजाब को मज़दूर मुहैया कराती है तो बिहार के लाखों बेरोज़गारों को बेहतर मज़दूरी पाने का एक मौक़ा देती है। आम लोग इसे 'पलायन एक्सप्रेस' भी कहते हैं। ट्रेन मज़दूरों को ढोती है इसलिए। सफ़र सुहाना नहीं, मुश्किलों भरा होता है।
रेलगाड़ी चल चुकी थी। गेट पर ख़ासी अफ़रा-तफ़री थी। पैर रखने तक के लिए भी लोग झगड़ रहे थे।
प्रमोद यादव से सरदार प्रमोद सिंह
इसी ट्रेन से सफ़र कर रहे एक मुसाफिर अल्ताफ ने बड़े इत्मिनान से कहा कि रात होते-होते सारे लोग अपनी-अपनी जगह तलाश लेंगे। जाहिर है कि ये मजदूर सफर की मुसीबतों के आदी हो चुके हैं।
सहरसा स्टेशन पर इंतजार करते मुझे मिले अधेड़ उम्र के प्रमोद सिंह। सालों से पंजाब में राजमिस्त्री का काम करते हैं। अररिया ज़िला के प्रमोद सिंह 2006 में सिख हो गए। कभी-कभी अपने गांव आते हैं।
पंजाब में सपरिवार बस गए हैं। रोज़ी-रोटी के संघर्ष ने बिहारी प्रमोद सिंह यादव को पंजाब का सरदार प्रमोद सिंह बना दिया है। बिहार के पिछड़ेपन के चलते विस्थापन करने वाले प्रमोद सिंह एक नहीं, हजारों में हैं।
मजबूरी है बाहर जाना
आगे की सीट पर मधेपुरा जिला के फागु अपनी पत्नी और तीन बच्चों के साथ बैठे हैं। 40 साल के मजदूर फागु परदेस में दो-ढाई सौ रुपए हर दिन कमा लेते हैं। अब की बार एक हज़ार रुपया महाजन से सूद पर पैसा लेकर जा रहे हैं।
करीब 20 साल से परदेस में काम कर रहे हैं। वहां मन लग गया है। कहते हैं कि यहां न तो अपना खेत है और न ही मजदूरी। कल फागु भी बिहार छोड़ने वालों की सूची लम्बी कर सकते हैं।
पप्पू महतो, पंजाब के उना शहर में मजदूरी करते हैं। भीड़ के बीच बोगी में मधेपुरा ज़िला के 27 साल के पप्पू महतो मिले। पत्नी किरण देवी भी दो बच्चों के साथ बैठी थीं।
पंजाब से सटे हुए हिमाचल के उना शहर में मज़दूरी करने वाले पप्पू कहते हैं कि हर बार घर आने पर पत्नी साथ चलने को ज़िद करती थी। अबकी बार नहीं मानी इसलिए साथ ले कर जा रहे हैं।
काम की कमी व बढ़ती ग़रीबी के कारण बिहार में बहुत कुछ टूट और बदल रहा है।