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हेमा और जया में कौन फिल्मी, कौन नेता?

Sat, 22 Mar 2014 11:34 AM IST
वेद विलास उनियाल/अमर उजाला, नई दिल्ली
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मथुरा की लोकसभा सीट अचानक ग्लैमरस हो गई। भाजपा ने काफी सोच विचार के बाद हेमामालिनी को अपना प्रत्याशी बनाया है। आरएलडी के जयंत चौधरी के जाट बिरादरी के वोट में सेंध नहीं लग पा रही थी। हेमा मालिनी का नाम इसी रणनीति पर आगे लाया गया है कि वो जाट बिरादरी को प्रभावित कर सकती है।
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जयंत चौधरी भी थोड़ा सजग हो गए हैं। एक समय की जानी-मानी अभिनेत्री और नृत्यांगना हेमामालिनी की उम्मीदवारी चुनाव को रोचक और संघर्षपूर्ण बना रही है। जयंत अब कह रहे हैं कि वह जमीन से जुड़े नेता हैं और फिल्म स्टारों से राजनीति नहीं चलती। जयंत ने मथुरा संसदीय सीट को लेकर यह तो कह दिया है, लेकिन शायद उन्हें ध्यान नहीं आया कि हाल ही में उनकी पार्टी में जयाप्रदा शामिल हुई हैं जो स्वयं में एक बड़ी अभिनेत्री रही हैं। और संयोग से वह भी दक्षिण भारत की हैं, जो फिल्म जगत से राजनीति में आई हैं।

जयंत चौधरी फिल्म स्टारों के राजनीति में आने के बारे में जो भी राय रखते हों, लेकिन वह जयाप्रदा और हेमामालिनी पर अलग अलग धारणा नहीं बना सकते। अगर उनकी राय में फिल्म स्टार कुछ नहीं कर सकते तो फिर उन्हें अपनी सहयोगी पार्टी कांग्रेस पर भी गौर करना चाहिए। खासकर नगमा और राज बब्बर उन सीटों पर चुनाव लड़ने जा रहे हैं, जहां कांग्रेस को आरएलडी के सहयोग की जरूरत है।
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नीला बनाम नीला

यहां उत्तर प्रदेश के नीले रंग की बात नहीं हो रही। महाराष्ट्र में नीले रंग पर काफी चर्चा है। एक समय कांग्रेस या शरद पवार इस नीले रंग को बड़ी कुशलता से साधते थे और अपने रंग को चटख बनाने में उपयोग करते थे। लेकिन अब नीला रंग केसरिया के साथ घुलमिल गया।

रामदास अठावले ने रिपब्लिकन पार्टी का शिवसेना के साथ विलय करा दिया था। यह ऐन चुनाव से पहले का समझौता न होकर काफी पहले सोची-विचारी रणनीति का हिस्सा था। इससे लगा कि इस बार चुनाव प्रचार में नीला रंग शायद नजर न आए। हां, नीली पताका फहराने वाले शिवसेना के नारे लगाते हुए नजर आएं। मगर दलित आंदोलन की धरती में क्या लोगों की नजरों में बसा नीला रंग गायब हो सकता है।

शायद इसीलिए अगर रामदास अठावले शिवसेना में चले भी गए तो दलित आंदोलन और उसके आधार पर राजनीति करने वाले कुछ संगठन अपनी ध्वज पताका फहरा रहे हैं। यानि प्रचार में नीला रंग कायम रहेगा। भले उसका असर राजनीति परिदृश्य को बदलने में ज्यादा सक्षम नहीं है।

रैली बनारस की, लोग दिल्ली के

आम आदमी पार्टी बनारस की रैली को कुछ खास बनाना चाहती है। पार्टी को पता है कि बनारस की रैली खासी चर्चाओं में रहेगी। इसलिए नहीं कि रैली के जरिए कुछ सूत्र टटोले जाएंगे। बल्कि इसलिए कि भाजपा से मोदी के प्रत्याशी बनने और आप की चुनौती के बाद बनारस कई मायनों में अहम हो गया।

आप और उसके नेता अरविंद केजरीवाल यह दिखाने की कोशिश कर रहे हैं कि मोदी के सामने वही असली प्रत्याशी हैं। यानी लड़ाई मोदी बनाम केजरीवाल की है। यह अलग बात है कि मोदी कहीं भी केजरीवाल का नाम नहीं ले रहे। फिर भी आम लोगों के लिए दिलचस्पी यही होगी कि वहां 25 को कैसा माहौल होता है। अब यह रैली खास है तो प्रबंध भी खास ही होने चाहिए। इसलिए आप कह रही है कि 1 हजार रुपए लाओ और बनारस चलो। यानी रेल का टिकट, खाने पीने का खर्च उठा सकते हो, तो दिल्ली से रैली में चलिए। आप खास कार्यकर्ताओं पर ही खर्च करेगी।

यह आप का अपनी तरह का प्रबंध है। अरविंद केजरीवाल की डिनर पार्टी की तरह एक हजार रुपए में बनारस चलने का आह्वान है। आप चाहती है कि बनारस में कुछ मजमा जुटे। दिल्ली में पिछले कुछ महीने से जूझ कर पारंगत हुए कार्यकर्ता अगर बनारस पहुंच गए तो हर-हर मोदी घर-घर मोदी का जवाब दे दिया जाएगा। अमेरिका की तर्ज पर डिनर पार्टी से तो पैसे जुट गए। पर देखना है पर्स से हजार रुपए खर्च कर कौन काशी में पहुंचता है?
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शिवसेना का उत्तर प्रदेश

शिवसेना को केवल महाराष्ट की पार्टी कहने वालों के लिए होमवर्क का समय है। इस बात पर मत जाइए कि शिवसेना ने अगर उप्र लोकसभा में अपने उम्मीदवार खड़े किए तो उसे कितने वोट मिलेंगे। जमानत जब्त होना तो तय है। पर इस पार्टी को गोरखपुर, देवरिया, लखीमपुर, मिर्जापुर, आजमगढ़, बदायूं, सहारनपुर और श्रावस्ती; हर जगह उम्मीदवार मिल रहे हैं तो इतना तो कह सकते हैं कि पार्टी का कोई नाम लेवा भी है।

वैसे बात तो बिहार की भी हो रही है। शिवसेना उम्मीदवार खड़े करके क्या हौसला दिखाए पर भाजपा पर इतना अहसान कर रही है कि बनारस और लखनऊ की सीट पर उम्मीदवार खडे नहीं कर रही। हो सकता है कि शिवसेना सपा की तरह थोड़ा और दरियादिली दिखाकर कहें कि सम्मानित और बड़े नेताओं के खिलाफ चुनाव नहीं लड़ना चाहिए। इसलिए अमेठी और रायबरेली में कांग्रेस को राहत देते हैं।

अभी शिवसेना के रूठने-मनाने का दौर चल रहा है। शिवसेना के प्रमुख उद्धव ठाकरे की नींद किसी और ने नहीं, चचेरे भाई ने उड़ाई हुई है। डर महाराष्ट्र की उन 23 सीटों पर है जहां मनसे वाले भी सामने होंगे। पर तिलमिलाए हुए भाजपा पर हैं। मनसे के लिए सॉफ्ट होना खटक रहा है। इसलिए उप्र की ओर भी धनुष साधा जा रहा है।
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