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घर पर बोझ नहीं है, घर का बोझ उठाती है ये

Sat, 04 Jan 2014 01:17 PM IST
अमर उजाला, नोएडा
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ये बेटी घर पर बोझ नहीं है, बल्कि घर का बोझ उठाती है। खुद के पेट में भले ही एक निवाला न जाए, लेकिन मां की दवा के लिए दिनभर पसीना बहाती है। सिर पर पिता का साया नहीं है, लेकिन मुश्किलों में बिल्कुल नहीं घबराती है।
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राह कितनी भी कठिन क्यों न हो, रुकती नहीं... बस चलती जाती है। ये बेटी है 18 साल की रिंकू। निठारी की झुग्गी में रहने वाली रिंकू उन लोगों को सोचने पर मजबूर कर देती है, जिनकी नजर में बेटियां बोझ होती हैं।

आठ साल पहले सुदेब सरकार और मंजू सरकार अपनी बेटियों पिंकू और रिंकू के साथ पश्चिम बंगाल से निठारी आए। पिता ने एक कंपनी में साफ-सफाई का काम शुरू किया। बड़ी बेटी पिंकू की शादी के बाद पिता रिंकू के विवाह को लेकर परेशान थे और यहीं से शुरू हुआ रिंकू के संघर्ष का सफर।
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पिता पेट की गंभीर बीमारियों से घिर गए और बिस्तर पकड़ लिया। जिस उम्र में एक लड़की गुड्डे-गुडिय़ों से खेलती है, रिंकू ने घरों में चूल्हे-चौके का काम संभाल लिया। कई सालों के लंबे इलाज में न केवल रिंकू के कमाए पैसे स्वाहा हुए, बल्कि उसके सपने भी झुलस गए।

करीब एक महीना पहले रिंकू के सिर से पिता का साया उठ गया और इसके बाद मां भी पेट की तकलीफ से लाचार हो गईं। इस मुश्किल घड़ी में भी रिंकू ने हिम्मत नहीं हारी। बेटी ने मां के इलाज के लिए ज्यादा घरों में काम करना शुरू किया।

काम के साथ-साथ रिंकू ने निठारी के उगता सूरज सेंटर में सिलाई सीखी और कपड़े सिलना भी शुरू कर दिया। रिंकू बताती है कि मां के इलाज में साढ़े चार लाख रुपए खर्च हुए। कुछ पैसे उसने जमा किए थे और कुछ पैसे मदद से जमा हुए।

स्वाभिमानी बेटी कहती है कि लोगों के पैसे वह खाना बनाकर चुकाएगी। घर का खर्च सिलाई से उठाएगी। लेकिन, रिंकू के मुश्किल सफर का अंत यहीं नहीं हुआ। एक बार फिर रिंकू के सामने चुनौती है। उसकी मां को फेंफड़ों का संक्रमण है।

मुश्किलों के इस तूफान में भी रिंकू का हौसला अडिग है, इरादे पहले से ज्यादा मजबूत हैं। मां के इलाज के लिए बेटी एक बार फिर कमर कस चुकी है, बगैर डरे... बगैर थके।
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