परम्पराओं को मानना कोई बुरी बात नहीं है। मगर जिसे आपका मन भी उसे स्वीकार न करे, ऐसी असंगत चीजों को परम्परा के नाम पर ढोना तो हरगिज सही नहीं है। बेटियों के साथ भेदभाव का मनोविज्ञान भी इसी श्रेणी में आता है।
इसे कभी सामाजिक रिवाज तो कभी कुल की मर्यादा या संस्कार के नाम पर पोषित किया जाता रहा मगर समय आ गया है कि हम पूरी कोशिश करके इस किस्म के अभिशाप से मुक्ति पा लें।
लोगों की सोच में बदलाव आ भी रहा है मगर यह प्रक्रिया और तेज तभी हो सकती है जब मान्यताओं और वर्जनाओं को दरकिनार करने की ईमानदार कोशिशों को समाज से भी जोरदार समर्थन मिले।
अमर उजाला की 'बेटी ही बचाएगी' मुहिम के तहत 'कॉफी विद एडिटर' कार्यक्रम में मंगलवार को शिक्षाविद् और चिकित्सक डा. अशोक प्रसाद तथा गोरखपुर यूनिवर्सिटी की रिटायर्ड प्रोफेसर प्रतिभा खन्ना से बातचीत के दौरान ऐसी ही बातें सामने आईं।
डा. अशोक प्रसाद
बेटियों को जो स्थान मिलना चाहिए, वह नहीं मिला है। और कमोबेश यह स्थिति पूरी दुनिया की है। पूर्वोत्तर के कुछ क्षेत्रों में जहां जनजातियां हैं, वहां मातृसत्तात्मक समाज है।
ऐसा ही कुछ और समाजों में है। पर, ऐसे समाज अपवाद जैसे हैं। सच्चाई यह है कि परम्पराओं के नाम पर लड़कियों के लिए तय खास दायरे से बाहर निकलने पर समाज अब भी असहज हो जाता है।
यह विसंगति जरूर है मगर समाज ने ममत्व को, घर-परिवार की देखभाल को वह महत्व नहीं दिया, जो बाहर निकलकर भोजन के इंतजाम करने को। और स्त्रियों की तुलना में पुरुषों के हिस्से यह काम ज्यादा रहा है।
मगर आज तो बेटियों को बाहर निकलकर उतना ही श्रम करते तो देखा जा रहा है, फिर भी सोच में पर्याप्त बदलाव नहीं आया। हालांकि विज्ञान ने साबित किया है कि बेटों के मुकाबले बेटियां मानसिक रूप से ज्यादा मजबूत होती हैं और समर्थ भी।
इस स्थिति में बदलाव के लिए निजी स्तर पर सोच बदलने की जरूरत है। साथ ही बेटियों के पक्ष में न्याय न करने वालों का सामाजिक बहिष्कार भी जरूरी है। पर, इस किस्म की पहल के लिए राजनेता या धर्मगुरुओं से पहल की उम्मीद बेमानी है। यथास्थिति ही उनके फायदे की लगती है।
नई पीढ़ी का भविष्य तय करने वाला हमारा शिक्षा तंत्र भी उतना नहीं कर पा रहा है, किसी बड़े बदलाव के लिए जरूरी है। सिद्धांत रूप में हम स्त्री को देवी का दर्जा देते हैं, लेकिन खाप पंचायतों के फैसले वाले भी हमारे समाज में ही हैं। बेटा अपने मन से जीने की सोचे तो स्वीकार मगर बेटी अपना जीवनसाथी चुन ले तो हल्ला मचता ही है। सोच के स्तर पर प्रदूषण है।
'लोग कहते तो हैं कि दहेज प्रथा सामाजिक बुराई है, लेकिन इसके खिलाफ करते क्या हैं? व्यक्तिगत स्तर पर मैं दहेज लेने वालों से नेह का कोई रिश्ता नहीं रखता। बेटियों के लिए यह शपथ हम सभी को लेनी होगी।
प्रो. प्रतिभा खन्ना
दरअसल लोगों को यह तो पता है कि उनकी जिन्दगी में बेटियों का महत्व क्या है। वे बखूबी समझते हैं कि बेटी के बिना सृष्टि का अस्तित्व नहीं, लेकिन संस्कृति और सामाजिक मान्यताओं के कारण उसकी बेहतरी की कोशिश नहीं हो पाती है। दहेज और घर से बाहर असुरक्षा का माहौल भेदभाव के मनोविज्ञान को और मजबूती देते हैं।
शारीरिक रूप से भी बेटियां मजबूत होती हैं, पर हम उन्हें सही ढंग से पोसते कहां हैं? घर में कुनबे की महिलाएं सबसे बाद में भोजन करती है। बेटों की शिक्षा और उनके खाने-पीने को ज्यादा महत्व मिलता है। इतना ही नहीं, मांए यही सीख अपनी बेटियों को भी देती है। परिवार का यह माहौल समाज की स्थिति भी तय करता है।
सामाजिक मानकों में भी परिवर्तन की जरूरत है। ऐसे मानक जो बेटी की तरक्की को धार्मिक अथवा सामाजिक व्यवस्था के प्रतिकूल मानते हैं, उन्हें खत्म किया जाना चाहिए। व्यक्ति की सोच पर इनका काफी असर है। इससे मुक्त होने पर ही उसकी सोच निर्मल होगी, जिससे बेटियों को स्वस्थ माहौल मिलेगा और वे सही अर्थों में तरक्की कर सकेंगी।
शिक्षा और ऐसे दूसरे माध्यमों से बदलाव आ रहा है। शिक्षण संस्थाओं में बेटियों की संख्या बढ़ रही है। वे आत्मनिर्भर भी बन रही हैं, लेकिन यह बहुत थोड़ा है। अभी काफी कुछ करने की जरूरत है। यह सच है कि सोच के स्तर पर जब तक बेटा और बेटी के बीच की खाई नहीं खत्म होगी, समस्या पूरी तरह खत्म नहीं होगी।
'बेटी कमाकर अगर मां-बाप का इलाज कराती है तो भी उसे पराया कहते हैं। बड़े होने तक उस पर संभालकर खर्च करते हैं क्योंकि दहेज तो देना ही है। ऐसी सोच छोड़ें, आइए शपथ लें कुदरत की सबसे अनूठी इस रचना के हक में।