बेटी को दुहिता भी कहते हैं। यह शब्द दुहने से निकला है। बेटियां ही सुबह जानवरों को चारा-पानी देती थीं और दूध दुहती थीं। बेटी जैसी हिफाजत और देखभाल करने वाला कोई दूसरा कहां है।
अमर उजाला के कार्यक्रम 'काफी विद एडिटर' में बात ऐसे ही निकली और पहुंची कि समाज की हिंसा का समाधान बेटियों की आजादी में है। कला प्रकाश के अशोक कपूर और कवि रामाज्ञा शशिधर से चर्चा का लब्बोलुआब यह रहा कि चल और अचल संपत्ति के नजरिए से बेटियों को देखने की आदत को बदलना होगा।
'राधा झाड़ू लगाएगी और मोहन केला खाएगा' की दृष्टि बदलने पर ही बेटियां बुढ़ापे की लाठी बनेंगी। तब भरोसा हो जाएगा कि बेटी ही बचाएगी वह सब जो सुंदर है, जिसमें रस है और जिसमें जीवन का सार है।
श्रम करने और आजादी का लुफ्त लेने का मिले मौका: रामाज्ञा शशिधर
* स्वतंत्रता व्यक्ति का मूल लक्षण है। निजी और सामाजिक दोनों ही दायरे में बेटियों को पूरी आजादी देनी होगी। अपनी अतिरिक्त स्वतंत्रता के लिए दूसरों की आजादी छीने की प्रवृत्ति का त्याग जरूरी है।
* दहलीज के भीतर के काम को अनुत्पादक समझने की आदत ठीक नहीं है, क्योंकि रसोईघर में भी सृजन और उत्पादन होता है। वहां भी साझेदारी की संस्कृति शुरू करनी चाहिए।
* घर से बाहर की दुनिया में बेटियों को समान रूप से श्रम करने और आजादी के सभी पहलुओं का आनंद उठाने की छूट होनी चाहिए। आर्थिक मोर्चे पर संपन्न बेटी ही समाज को बचाएगी।
* शादी की पुरानी संस्था को बदलना होगा। बेटी खूंटे से बांधने के लिए नहीं होती है। यहां आकर लगता है कि उनके लिए गढ़े गए शुचिता के पैमाने को आज के समाज के हिसाब से बदलना होगा।
* मातृत्व, वात्सल्य, सौंदर्य, प्रेम, करुणा उसकी अतिरिक्त पूंजी है। स्त्री हिंसा विरोधी होती है और समाज में बढ़ रही हिंसा से वही मुक्ति दिलाएगी। पुरुष अपना हक खोना नहीं चाहता है, इसलिए स्त्री के प्रति हिंसा बढ़ी है।
* हमारी बेटियों की जिंदगी और भविष्य में अमर उजाला की यह मुहिम उजाले की लौ की तरह है। 'बेटी के हक मेंÓ शपथ जरूर लें।
बेटी और बेटा दोनों की हो समान रूप से परवरिश: अशोक कपूर
* बेटा सिर्फ पिता का प्रतिनिधि होता है। बेटियां पिता के साथ-साथ पति के परिवार का भी प्रतिनिधित्व करती हैं। उनकी परवरिश उसी तरह होनी चाहिए, जिस तरह बेटों की। दोनों को समान शिक्षा मिलनी चाहिए।
* पेप्सीको की सीईओ इंदिरा नुई अमेरिका में रहती हैं लेकिन वह जब भी चेन्नई आती हैं, अपने घर में ही रुकती हैं। यह बेटी की संवेदना है। यह आश्वस्त करती है कि बेटी ही संस्कृति की संवाहक होगी।
* बेटियों के शादी के बाद ससुराल जाने के बाद भी उतना ही महत्व देना होगा। उनको पैतृक संपत्ति में भी हक मिलना चाहिए। मेरे भाई के प्रकाशन समूह को बेटी और बेटा मिलकर चलाते हैं।
* मेरे पास बेटी नहीं है। बहू आर्किटेक्ट है। पत्नी ने उसे रसोईघर से आजादी दे रखी है। इससे बेटा और बहू दोनों ही अपना-अपना काम ठीक से कर रहे हैं।
* ऐसी भी बेटियां हैं जो विदेशों में रह रही हैं और अपने माता-पिता को अपने खर्च पर बुलाती हैं। बेटियां ज्यादा खयाल रखती हैं। यदि माता-पिता के घर में उन्हें बराबरी का हक मिले तो समाज बेहतर होगा।
* केवल कानून बनाने से स्त्रियों के खिलाफ हिंसा नहीं रुकेगी। अखबार जागरूकता की मुहिम चलाएंगे तभी समाज संवेदनशील होगा। अमर उजाला की मुहिम में हिस्सा लें और 'बेटी के हक में' शपथ पत्र भी भरें।