ये कहना है बस्तर ज़िला पुलिस के एक जवान का जिसे पिछले हफ़्ते मलेरिया हो गया था। पहले तो उस जवान को इलाज के लिए जगदलपुर के ज़िला अस्पताल लाया गया और जब बात नहीं बनी तो फौरन रायपुर ले जाया गया। तब जाकर बड़ी मुश्किल से जान बची। लेकिन हर कोई इस जवान की तरह किस्मत वाला नहीं होता।
पिछले गुरुवार को ही झीरम कैंप में पदस्थ पुलिस के आठ जवानों को मलेरिया होने के बाद जगदलपुर के महारानी अस्पताल में भर्ती कराया गया था। आठ जवानों में से 26 साल के गोविंद तामंग ने शुक्रवार को दम तोड़ दिया।
उनके पिता सहदेव तामंग कहते हैं, “मेरा बेटा दुश्मनों से लड़ते हुए नहीं, मच्छरों के कारण मारा गया।” पिछले महीने भर में बस्तर में 200 से अधिक पुलिस के जवानों को मलेरिया हुआ और आज भी 50 से अधिक से जवान तो जगदलपुर से लेकर रायपुर के अलग-अलग अस्पतालों में भर्ती हैं।
मच्छरों का भारी प्रकोप
पहले तो बस्तर के जंगलों में मच्छरों का प्रकोप बहुत है। और मलेरिया के कारण मरने वाले आदिवासियों की संख्या सरकारी दस्तावेज़ों में दर्ज़ भी नहीं होती। एक ओर मच्छरों पर दवाओं का असर नहीं हो रहा तो दूसरी ओर मलेरिया पीड़ितों पर मलेरिया की आम दवाओं का।
बस्तर के मलेरिया अधिकारी डॉक्टर संजय बसाक कहते हैं, “बस्तर में पुलिस के अधिकांश जवान जंगल के इलाक़े में रहते हैं। ख़राब पानी पीते हैं, ख़राब जगहों में दिन-रात गुजारते हैं। इन इलाक़ों में मच्छरों का भारी प्रकोप है।”
दवाओं की कमी
नवंबर में 200 से अधिक पुलिस जवानों को मलेरिया हुआ। डॉक्टर बसाक का कहना है कि पुलिस और सुरक्षाबल के जवान, मलेरिया होने के बाद दवा की जो पूरी ख़ुराक लेनी चाहिए, उसके प्रति लापरवाही बरतते हैं। इसके कारण कई बार उन पर दवा का असर नहीं होता और स्थिति बिगड़ जाती है। जबलपुर स्थित रीजनल मेडिकल रिसर्च सेंटर फॉर ट्राइबल का दल पिछले सप्ताह से मच्छरों और मलेरिया पर शोध कर रहा है। लेकिन सब कुछ पता चल जाए तो भी स्थिति सुधरेगी इसकी उम्मीद कम ही है।
बस्तर में 150 डॉक्टरों के भरोसे 1141 अस्पताल और स्वास्थ्य केंद्र हैं। अस्पताल की सुविधाओं का हाल ये है कि जगदलपुर के ज़िला अस्पताल में मलेरिया की दवा पिछले कई महीनों से है ही नहीं।