भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के नेता ए.बी. बर्धन का हाल में बयान आया है कि उनकी पार्टी नरेंद्र मोदी को सत्तासीन होने से रोकने के लिए ममता बनर्जी का साथ भी दे सकती है।
बाद में इसकी कुछ सफ़ाई भी दी गई लेकिन यह बयान अपने आप में बहुत महत्वपूर्ण है। इसके कुछ पहले कांग्रेस पार्टी की ओर से यह इशारा आया था कि चुनाव के बाद, ज़रूरी हुआ तो वह तीसरे मोर्चे की सरकार को समर्थन दे सकती है।
बाद में राहुल गांधी ने इसका खंडन कर दिया। इन दोनों ही वक्तव्यों पर कुछ बात करने की आवश्यकता है। लेकिन उससे पहले बनारस की कुछ बात कर ली जाए।
बनारस में कांग्रेस की रणनीति
कहा जा रहा है कि बनारस में कांग्रेस पार्टी ने एक निहायत ही कमज़ोर उम्मीदवार मैदान में उतार दिया है। इस वजह से उसके पारंपरिक मतदाता अरविंद केजरीवाल की ओर झुकते जान पड़ते हैं।
कांग्रेस की ओर से अब तक वहां कोई आक्रामक प्रचार देखा नहीं गया है। अब तक राहुल गांधी वहां नहीं गए हैं और मतदान से पहले उनके वहां जाने को लेकर कयास लग रहे हैं। अगर वे वहां नहीं जाते हैं तो कुछ दिलचस्प नतीजे निकाले जा सकते हैं।
बनारस से लौटे एक मित्र ने कहा कि कांग्रेस के बनारस के निर्णय और उसकी शिथिलता से लगता है कि वह परोक्ष रूप से अरविंद केजरीवाल का समर्थन कर रही है। चाहें, इस निष्क्रियता में ही मतदाताओं के लिए एक संदेश पढ़ सकते हैं।
'कांग्रेस शिथिल'
उनका कहना था कि भले अरविंद इसे न मानें क्योंकि कोई उनसे बातचीत करके तो यह मिलीजुली रणनीति नहीं बनाई गई, लेकिन सतर्क निगाहें कांग्रेस पार्टी के इस निर्णय को ताड़ सकती हैं।
भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी और कांग्रेस पार्टी इस देश के सबसे अधिक निंदित दल रहे हैं। लेकिन भारतीय राजनीति का इतिहास देखा जाए तो यह समझ में आता है कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ प्रवर्तित राजनीति के संवाहक जनसंघ और भारतीय जनता पार्टी की सांघातिकता को इनके मुक़ाबले और किसी ने संजीदगी से नहीं पहचाना।
कांग्रेस पार्टी की विडंबना यह रही है कि स्वयं उस पर हिंदूवादी दबाव आरंभ से ही रहा है। राजेंद्र प्रसाद, वल्लभ भाई पटेल, पुरुषोत्तम दास टंडन जैसे कुछ नाम तुरंत ही दिमाग़ में आते हैं जिनसे जवाहरलाल नेहरू का संघर्ष सर्वविदित है।
बाद में कर्ण सिंह और उनके साथ नेहरू की बेटी इंदिरा गांधी ने भी नरम हिंदूवादी संदेश देने में परहेज़ नहीं किया। इस हिंदूवादी दबाव का ही नतीजा था राजीव गांधी सरकार का बाबरी मस्जिद पर लगे ताले को खुलवा कर पूजा अर्चना की अनुमति का रास्ता खोलना।
कांग्रेस का सियासी गणित
चाणक्य कहे जाने वाले नरसिम्हा राव पर यह दाग़ है ही कि बाबरी मस्जिद के ध्वंस को रोकने में उन्होंने दिलचस्पी नहीं ली। इसकी एक व्याख्या यह की जाती रही है कि राव ने एक गहरी रणनीतिक चाल में भारतीय जनता पार्टी से उसका तुरुप का पत्ता ही छीन लिया।
इस चाल के लिए कांग्रेस ने भारी क़ीमत चुकाई है। उसने मुसलमानों का ही नहीं उदार हिंदुओं के एक बड़े तबके का विश्वास खो दिया और इस मान्यता को बल मिला कि उसमें और भारतीय जनता पार्टी में शायद ही कोई फ़र्क़ है।
कांग्रेस और भाजपा एक ही सिक्के के दो पहलू हैं, यह दूसरे वामपंथी दलों ने कहा हो, भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी ने नहीं कहा। दोनों के बीच के मूलभूत अंतर को पहचानने के लिए किसी गहरी राजनीतिक सूझ की आवश्यकता नहीं है, सिर्फ़ राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के नीति-दस्तावेज़ों को पढ़ लेने की ज़रूरत है।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और भारतीय जनता पार्टी कोई सामान्य जनतांत्रिक संगठन नहीं हैं जिनसे आप मतभेद रखते हुए बहस करते रहें। मेरे विचार में यह वैसा तत्व है जिसे जनतांत्रिक राजनीति के शारीरिक तंत्र में प्रवेश देने का अर्थ है उसकी मृत्यु की प्रतीक्षा करना।
'भाजपा अस्वीकार्य'
भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के नेता बर्धन ने इसीलिए अगर इस समय बंगाल में वामपंथ की परम शत्रु ममता बनर्जी का साथ देने की बात कही है तो उनका संदेश साफ़ है। उनका आशय यह है कि जनतंत्र के लिए भारतीय जनता पार्टी अस्वीकार्य है।
वह इस समय इतनी अस्वीकार्य है कि अपने प्रतियोगी, राजनीतिक शत्रु से परहेज को भी इस राजनीतिक ‘इमरजेंसी’ में दरकिनार करने की हद तक जाया जा सकता है।
बर्धन कह यह रहे हैं कि अगर भारतीय जनता पार्टी में 'फ़ासीवाद' की धमक सुनाई पड़ रही है तो उसका मुक़ाबला पारंपरिक प्रतियोगी जनतांत्रिक राजनीति की भाषा और उसके तौर तरीकों से नहीं किया जा सकता। इस समय तो आपात उपाय ही करने होंगे।
असल बात यह है, जिस पर इस चुनाव में बहस शुरू से चलती रही है कि भारतीय जनता पार्टी के इस दौर की व्याख्या कैसे की जाए। प्रताप भानु मेहता, रामचंद्र गुहा, मेघनाद देसाई, आशुतोष वार्ष्णेय जैसे उदार बुद्धिजीवी कहते रहे हैं कि नरेंद्र मोदी नीत भारतीय जनता पार्टी को फ़ासीवादी बताना अतिरेक है।
इसका निष्कर्ष स्पष्ट है कि उसके सत्ता में आने पर भारतीय जनतांत्रिक तानेबाने को कोई प्राणांतक क्षति नहीं पहुंचेगी। इसका अर्थ है कि यह राजनीतिक विचारधाराओं और नीतियों की प्रतियोगिता पर आधारित एक सामान्य चुनाव है। दूसरी समझ वह है जो ए. बी. बर्धन ने अभी व्यक्त की।
यह साधारण चुनाव नहीं है और इसमें अपने मतों का प्रतिशत और सीटें बढ़ाना उतना ज़रूरी नहीं जितना भारतीय जनता पार्टी को पूर्ण बहुमत से दूर रखने या सत्ता से दूर रखने के उपाय करना।
देर से आया बयान
बर्धन की यह समझ दुर्भाग्य से एक तो काफ़ी देर से व्यक्त हुई है, दूसरे स्वयं वामपंथ में आम तौर पर इस आपातस्थिति की गंभीरता का अहसास नहीं है। बनारस में सी.पी.एम. जिस गंभीरता से चुनाव लड़ रही है, उससे इसका अंदाज़ा लगाया जा सकता है।
लेकिन बनारस में ही रुस्तम सैटिन जिस दल के नेता थे, वह यानी भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी अन्यत्र अपनी सहयोगी सी. पी. एम. के पक्ष में प्रचार करती नहीं दिख रही। संभवतः उसने अपने समर्थकों को यह संकेत दिया है कि अगर मुक़ाबले में अरविंद दिख रहे हैं तो उनका साथ दिया जाना चाहिए।
बारह साल पहले फ़्रांस के राष्ट्रीय चुनाव में वहां की अति राष्ट्रवादी नेशनलिस्ट फ़्रंट के नेता ले पेन अन्य सभी उम्मीदवारों को पछाड़ते हुए दूसरे दौर में पहुंच गए थे। वामपंथी, समाजवादी और अन्य जनतांत्रिक दल चौकन्ने हो गए और उन्होंने अपने लिए गर्हित घोर दक्षिणपंथी याक शिराक के समर्थन का निर्णय किया।
कितना होगा असर?
उस समय का एक पोस्टर काफ़ी चर्चित हुआ-'चोर को वोट दो, फ़ासिस्ट को नहीं।'
जनतांत्रिक मजबूरी के चलते शिराक को मत देने वालों ने प्रस्ताव किया कि हम सब नाक को रुमाल से दबा कर मतदान करने जाएं जिससे साफ़ हो कि शिराक से हमें घिन है पर अभी हमारे पास और कोई चारा नहीं बच गया है।
ए.बी. बर्धन का प्रस्ताव सिर्फ बंगाल के संदर्भ में ही नहीं, अन्य राज्यों के लिए भी संकेत है। देखना यह है कि इस संकेत को किस तरह ग्रहण किया जाता है।