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इसलिए, हर साल सैकड़ों जवान होते हैं शहीद!

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सैनिक चाहे जितना बहादुर और खुद्दार क्यों न हो लेकिन असल की जान उसके हथियार होते हैं। वहीं आतंकवाद से जूझ रही भारतीय पैदल सेना(इंफैट्री) हथियारों की जबरदस्त कमी का सामना कर रही है। सेना के पास न तो उन्नत राइफल है और न ही गुणवत्ता की बुलेट प्रूफ जैकेट, जबकि कारगिल संघर्ष के बाद से इसका ब्लू प्रिंट तैयार और सेना करीब दस वर्ष से लगातार इसकी मांग कर रही है। हालत इतनी बदतर है कि सेना के पास गुणवत्ता की कार्बाइन, लाइट मशीन गन, नाइट विजन डिवाइस तक नहीं है। यहां तक कि सीमा पार के आतंकी उससे बेहतर हथियार के साथ घुसपैठ का दबाव बनाए हैं।
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सेना की इंफैट्री इकाई से जुड़े वरिष्ठ अधिकारी के मुताबिक हर साल सेना के 75-100 जवान मुठभेड़ के दौरान शहीद हो रहे हैं। इनकी शहादत का एक बड़ा कारण गुणवत्ता की बुलेट प्रूफ जैकेट का न होना है। आतंकवाद प्रभावित क्षेत्र में तैनात जवान डीआरडीओ द्वारा विकसित इनसास राइफल पर भी बहुत भरोसा नहीं करते।

अभी भी इनसास राइफल से रह-रहकर शिकायतें आ रही हैं। पहले इंसास की मैगजीन टूट जाती थी, उससे तेल निकलते थे और कभी कभी मुठभेड़ के दौरान भी सैनिक धोखा खा जाते थे। ऐसे में जम्मू-कश्मीर में आतंकवाद से जूझ रहे सैनिकों की पहली पसंद अभी भी एके-47 राइफल है।
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ब्लू प्रिंट पर कोई खास अमल नहीं

इंफैट्री के पूर्व डीजी इंफैट्री लेफ्टिनेंट जनरल राजिंदर सिंह के मुताबिक उनके समय में ही पैदल सेना को अत्याधुनिक साजो-सामान से सुसज्जित करने की योजना थी। इसके लिए बाकायदा रोड-मैप भी तैयार किया गया था। इतना ही नहीं अमेरिका के लैंड वारियर्स की तर्ज पर हम अपने जवानों को अत्याधुनिक साजो-सामान तथा प्रशिक्षण से लैस करने वाले थे। इसके तहत भविष्य के भारतीय सैनिक का भी एक ब्लू प्रिंट तैयार किया गया था लेकिन इस पर कोई खास अमल नहीं हो पाया।

वैसे भी सरकार रक्षा क्षेत्र में केवल रिक्वेस्ट फॉर प्रपोजल निकालती है, ट्रायल होते हैं। जब रक्षा सौदे की बारी आती है तो पूरी प्रक्रिया रद्द कर दी जाती है और इसे फिर से शुरू किया जाता है। इसके चलते सेना के पास न तो पर्याप्त तोपें हैं और न ही टैंक। यहां तक कि रात्रि कालीन आपरेशन में दुश्मन पर नजर रखने के लिए नाइट विजन डिवाइस भी नहीं है।

हालांकि सेना मुख्यालय सूत्रों का कहना है कि राइफल लेने के लिए परीक्षण चल रहा है। नवंबर 2011 में इसके लिए ग्लोबल टेंडर जारी हुआ था। इसके तहत करीब 65 हजार राइफल ली जानी है और एक लाख राइफल के देश में निर्माण के लाइसेंस के साथ खरीद प्रक्रिया को अंतिम रूप दिया जाना है। इस क्रम में समर, विंटर, हाई अल्टीट्यूड, मड ट्रॉयल पूरा करने के बाद अंतिम दौर में इटली की बरेट्टा एआरएक्स 160 और इस्राइल की एसीई-1 प्रतिस्पर्धा में है। जबकि शुरूआत में अमेरिका, स्विट्जरलैंड, चेक गणराज्य की राइफल भी दौड़ में शामिल थी।  इसी तरह से सरकार ने 2004 में 50 हजार बुलेट प्रूफ जैके लेने की प्रक्रिया शुरू की थी और अब 2015 में उस प्रक्रिया में 50 हजार जैकेट की संख्या को बढ़ाकर कुल एक लाख जैकेट लेने के लिए गतिविधियां आगे बढ़ रही हैं।  आशय यह कि 11 साल के भीतर भी इसे पूरा नहीं किया जा सका।

पिछले कई साल से सेना की मांग और दबाव को देखते हुए पिछले साल(2014) के अंत में 1.86 लाख जैकेट का दूसरा रिक्वेस्ट फॉर प्रपोजल भी जारी हुआ है। वहीं इस बारे में लेफ्टिनेंट जनरल राजिंदर सिंह का कहना है कि मोदी सरकार से कुछ उम्मीदें जरूर हैं लेकिन सरकार सेना की आर्टिलरी को लेकर इस तरह के परीक्षण और आरएफपी की कई बार एक्सरसाइज  कर चुकी है। जब सेना को हथियार और साजो-सामान मिल जाए तो जानिए।
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क्या कहते हैं सेना के लोग?

लेफ्टिनेट जनरल राजिंदर सिंह
पूर्व महानिदेशक इंफैट्री
सेना के पास गुणवत्ता की कॉलर युक्त बुलेट प्रूफ जैकेट, हेलमेट, नाइट विजन डिवाइस, राइफल, एलएमजी और कारर्बाइन हो तो हम आतंकवाद को करारा जवाब दे सकते हैं। एक अच्छी बुलेट प्रूफ जैकेट से करबी 60-70 जवानों की हर साल शहादत रोकी जा सकती है।
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कर्नल रोहन आनंद
प्रवक्ता, भारतीय सेना
राइफल का ट्रायल चल रहा है। बुलेट प्रूफ जैकेट पर रक्षा मंत्री ने हाल में कुछ कहा है। सरकार सैन्य बलों के आधुनिकीकरण के लिए गंभीर है। कई चीजों की कमी है उसे पूरा किया जा रहा है और इस दिशा में प्रयास जारी हैं।
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मेजर जनरल (पूर्व)अशोक मेहता:
कारगिल के बाद एफ-इंसास(भविष्य की पैदल सेना) का ब्लूप्रिंट तैयार हुआ था लेकिन आज तक यह कार्यक्रम व्यवहारिकता में आगे नहीं बढ़ पाया। पूर्व सेनाध्यक्ष जनरल विक्रम सिंह के समय में नई माऊंटेन ट्राइकिंग कोर का गठन हुआ था लेकिन उसके लिए पैसे का प्रावधान नहीं था। इस समय सेना वहां भी संसाधन की कमी से जूझ रही है और वॉर वेस्टेड रिजर्व से निकालकर माऊंटेन डिवीजन को हथियार और धन मुहैय्या कराया जा रहा है।
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