लाहौर की कोट लखपत जेल में सरबजीत सिंह पर कातिलाना हमला करने वाले पाकिस्तानी कैदी उसे जान से मारना चाहते थे। हमलावर कैदी लाहौर धमाके का बदला लेना चाहते थे।
उल्लेखनीय है कि 1990 में लाहौर में हुए धमाके में 14 लोगों की मौत हो गई थी। सरबजीत सिंह लाहौर धमाके का आरोपी है। धमाके के आरोप में उसे फांसी की सजा सुनाई गई थी।
मलिक मुबशिर (डिप्टी इंसपेक्टर जनरल ऑफ पुलिस) की शुरुआती जांच से पता चला है कि हमलावर अमीर आफताब और मुदस्सर, सरबजीत से बेहद घृणा करते थे।
हमलावरों ने सरबजीत पर हमला करने के लिए खास योजना बनाई। इन कैदियों ने चम्मचों को धारदार बनाकर बतौर चाकू उपयोग किया।
इसके अलावा घी की टिन से उन्होंने ब्लेड बनाए और फिर मौका मिलते ही उन्होंने सरबजीत पर हमला कर दिया।
हमलावर कैदियों के खिलाफ मामला दर्ज
लाहौर पुलिस ने सरबजीत सिंह पर हमला करने वाले दो पाकिस्तानी कैदियों पर जान लेने के प्रयास का मामला दर्ज किया है।
जेल अधिकारियों के अनुसार अमीर आफताब और मुदस्सर के खिलाफ कोट लखपत जेल के सहायक की शिकायत पर मामला दर्ज हुआ। दोनों पर पाकिस्तानी दंड संहिता की धारा 324 (जानलेवा हमला) और 334 (गंभीर रूप से घायल करना) लगाई गई है।
आफताब और मुदस्सर कोट लखपत जेल में क्रमश: 2009 और 2005 से हैं, इन्हें हत्याओं के मामले में फांसी की सजा सुनाई जा चुकी है। जेल अधिकारी के अनुसार मौके पर मौजूद अन्य दो कैदियों एहसानुल हक और मोहम्मद सफदर ने कहा कि वे सरबजीत को बचा रहे थे।
इससे पहले कहा गया था कि छह कैदियों ने सरबजीत पर हमला किया। इस बीच पाकिस्तानी पुलिस ने मामले की तहकीकात शुरू कर दी है और छह कैदियों से इस बारे में पूछताछ की गई है।
तो न होता हादसा
कोट लखपत जेल के अधिकारी भी सरबजीत पर हमले से सकते में हैं।
''द नेशन'' के अनुसार जेल के एक अधिकारी ने नाम गुप्त रखने की शर्त पर बताया कि पाक सुप्रीम कोर्ट के आदेशानुसार मौत की सजा पाए कैदियों को दिन में दो बार एक-एक घंटे के लिए बैरक से बाहर घूमने की छूट है। लेकिन उन्हें अकेले ही घूमने देने का आदेश है।
पाकिस्तानी कैदियों के मामले में इस नियम का पालन होता था, लेकिन सरबजीत को छूट के वक्त अन्य ‘खतरनाक’ कैदियों को भी घूमने दिया जाता था। अगर नियम का पालन हो रहा होता तो यह हादसा न होता।