केंद्र की सत्ता के सेमीफाइनल के नतीजे आ गए हैं। मतदाताओं ने बेहतर कामकाज करने वाली सरकारों को न तो इनाम देने में कंजूसी बरती है और न ही उम्मीदों पर खरा नहीं उतरने वाले दलों को सजा देने में।
मतदाताओं ने चारों राज्यों में कांग्रेस का सूपड़ा साफ कर यह तय कर दिया है कि पार्टी 2014 के फाइनल मुकाबले की रेस में बहुत पीछे छूट गई है। इतना पीछे कि इसकी भरपाई करना पार्टी के लिए बड़ी चुनौती है। सेमीफाइनल में भाजपा का परचम लहराने से निसंदेह नरेंद्र मोदी की प्रधानमंत्री पद की दावेदारी को और पंख लगे हैं।
भाजपा भी नतीजों से उत्साहित है, मगर दिल्ली में ‘आप’ की धमाकेदार एंट्री ने यह साफ कर दिया है कि इस जीत की उमंग में 2014 की चुनौतियों को भूल जाना महंगा साबित हो सकता है। दिल्ली में आम आदमी पार्टी (आप) के हैरतअंगेज प्रदर्शन ने बड़ा संदेश यह दिया है कि लोगों ने पुराने ढर्रे पर चल रही राजनीति को साफ नकार दिया है।
सेमीफाइनल के नतीजे कांग्रेस के लिए किसी बड़े सदमे की तरह हैं। स्थिति कुछ कुछ वर्ष 1989 की तरह है, जब बोफोर्स मामले में कांग्रेस के खिलाफ देशव्यापी बयार बही थी। कांग्रेस के खिलाफ यह लहर अचानक नहीं है।
वर्ष 2009 में इसी जनता ने गुड गवर्नेंस देने के लिए यूपीए को हाथों हाथ लिया था। मगर दूसरी पारी में महंगाई, भ्रष्टाचार, आर्थिक कुप्रबंधन पार्टी को डुबोता दिख रहा है। पार्टी ने इस मामले में न केवल विपक्ष के विरोध को अनसुना किया, बल्कि सत्ता में मदमस्त हो कर जनांदोलनों की भी परवाह नहीं की।
यही कारण है कि सेमीफाइनल में लोगों ने भाजपा को समर्थन देने से ज्यादा ध्यान कांग्रेस को सबक सिखाने पर दिया। इस कारण दिल्ली में ‘आप’ ने नया इतिहास रचा तो राजस्थान में कांग्रेस की सबसे करारी ऐतिहासिक पराजय हुई है। पार्टी की मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में सत्ता में आने की आस भी अधूरी रही।
हार के बाद सोनिया गांधी और राहुल गांधी का जनता की अपेक्षाओं और आकांक्षाओं को नहीं समझ पाने का कबूलनामा कांग्रेस की लोकसभा चुनाव की पहाड़ बनी चुनौती को जाहिर भी करता है।
बेशक नतीजों ने भाजपा को खुशियां मनाने का मौका दिया है, मगर खुशफहमियां पालने का नहीं। कम से कम दिल्ली के ऐतिहासिक परिणाम ने यह साबित कर दिया है कि भाजपा की राह बिल्कुल आसान नहीं है।
आप को हाथों हाथ लेकर जनता ने वर्तमान व्यवस्था के सभी राजनीतिक दलों को भी कड़ा संदेश दिया है। जनता ने पार्टियों को बता दिया है कि बदलो, वरना वह खुद नया विकल्प बना लेगी। शीला दीक्षित जैसी शख्सियत के साथ दिल्ली में तमाम धुरंधरों का आप के नए चेहरों के सामने ढेर हो जाना यह बताता है जनता अपनी ताकत पहचान गई है।
फिर 40 साल से कम उम्र के 70 फीसदी युवा मतदाता महज युवा होने को ज्यादा भाव देने के मूड में नहीं हैं। युवा भारत पुराने ढर्रे में चल रही राजनीति में व्यापक बदलाव की चाहत रखता है। चारों राज्यों के नतीजे दरअसल 2014 में इसी बदलाव की आहट का संकेत हैं।