जम्मू कश्मीर और झारखंड में चुनावों के बाद नतीजे सामने हैं। झारखंड में भाजपा जहां सरकार बनाती नजर आ रही है वहीं जम्मू-कश्मीर के नतीजे उसके लिए चौंकाने वाले हैं। क्योंकि जम्मू कश्मीर में पूरा जोर लगाने के बाद भी पार्टी दूसरे नंबर पर ही सिमटती नजर आ रही है।
हालांकि गत विधानसभा चुनावों के मुकाबले भाजपा की सीटों में 14 सीटों की बढोत्तरी हुई है, लेकिन पार्टी इससे संतुष्ट नहीं हो सकी। जम्मू-कश्मीर के चुनावों से सबसे ज्यादा झटका खुद प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को लगा है जिन्होंने घाटी के चुनावों में व्यक्तिगत रूचि रखते हुए यहां की जनता को हर तरह से लुभाने का प्रयास किया।
जम्मू संभाग में तो फिर भी पार्टी को अच्छी खासी सीटें मिल गईं लेकिन कश्मीर और लद्दाख की जनता ने भाजपा को पूरी तरह नकार दिया। आलम ये रहा कि कश्मीर घाटी में जिन प्रत्याशियों से पार्टी को सबसे ज्यादा उम्मीदें थी वो अपनी जमानत तक नहीं बचा सके।
कुल 50 सीटों में से एक पर भी नहीं खुला खाता
कश्मीर और लद्दाख्ा संभाग की कुल 50 सीटों में पार्टी एक सीट पर भी अपना खाता भी नहीं खोल सकी है। ऐसे में यह सवाल लाजिमी हो गया है कि हर जतन करने के बावजूद मोदी घाटी की जनता के दिल में जगह क्यों नहीं बना सके।
ऐसा भी नहीं है कि घाटी की जनता को भाजपा के नाम से चिढ़ है, बल्कि लोग आज भी वहां पूर्व प्रधानमंत्री और भाजपा के शिखर पुरुष अटल बिहारी वाजपेयी की तारीफ करते नहीं अघाते। किसी भी प्रधानमंत्री के मुकाबले वाजपेयी आज भी कश्मीर घाटी में सबसे ज्यादा लोकप्रिय हैं।
फिर क्या बात रही कि उसी पार्टी के नरेन्द्र मोदी हर कोशिश के बाद भी लोगों के दिलों में जगह नहीं बना सके। जबकि बाढ़ प्रभावित कश्मीरियों के बीच कई दौरे करने से लेकर चुनावी जनसभा में उन्होंने सबसे ज्यादा जोर घाटी में ही लगाया था।
अपने दौरों के दौरान मोदी यह कहने से भी नहीं चूकते थे कि यहां आना उन्हें अच्छा लगता है और वो अपने लोगों के बीच आते हैं, लेकिन उनकी बातों का घाटी की जनता पर कुछ असर देखने को नहीं मिला।
अनुच्छेद 370 के मुद्दे ने भी बिगाड़ी पार्टी की चाल
इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि जहां जम्मू संभाग की 37 सीटों में से भाजपा 24 पर कब्जा जमाने में सफल रही है जबकि कश्मीर और लद्दाख की कुल जमा 50 सीटों में से पार्टी के हिस्से में एक सीट भी नहीं आई।
घाटी के चुनावी नतीजों पर गौर करें तो ऐसा लगता है कि लोगों ने यहां मोदी के विरोध में वोट दिया। क्योंकि किसी भी सीट पर भाजपा का कोई भी उम्मीदवार मुख्य मुकाबले में नहीं दिखा।
घाटी में पार्टी का सबसे बड़ा चेहरा हिना बट तो मात्र 672 वोट ही बटोर सकी तो मोती लाल कौल जिन्हें दबी जुबान से मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार भी कहा जा रहा तो मात्र पौने दो सौ वोट ही पा सके।
घाटी के चुनावी नतीजों पर गौर करें तो एक बात साफ नजर आती है कि मोदी को लेकर वोटरों में यहां जबरदस्त धुव्रीकरण देखने को मिला, जिसके चलते लोगों ने मुफ्ती मोहम्मद सईद की पीडीपी को एकतरफा वोट दिया।