कानून मंत्री रहे अश्वनी कुमार को कोलगेट मामले में सीबीआई की स्टेटस रिपोर्ट में बदलाव कराने के आरोप में अपनी कुर्सी गंवानी पड़ी। कुमार का राजनीति में उत्थान और कैबिनेट से रवानगी काफी नाटकीय रही है।
देश के पूर्व एडिशनल सॉलिसिटर जनरल (एएसजी) रहे अश्वनी कुमार मई 2002 में राज्यसभा के लिए चुने गए। पंजाब के गुरदासपुर से ताल्लुक रखने वाले कुमार राज्यसभा में जाने से पहले एएसजी थे।
वह 2004 और 2010 में भी राज्यसभा के लिए चुने गए। संसद में प्रवेश के चार साल के भीतर ही 2006 में कुमार को केंद्रीय कैबिनेट में जगह मिल गई और उन्हें औद्योगिक नीति और संवर्धन तथा वाणिज्य और उद्योग मंत्रालय का राज्यमंत्री बनाया गया।
अश्वनी को प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह का करीबी माना जाता है। कोलगेट मामले में सीबीआई की स्टेटस रिपोर्ट में बदलाव के आरोपों से घिरे होने के बावजूद कैबिनेट से उनकी रवानगी में देरी की वजह पीएम से उनकी नजदीकी को माना जा रहा है।
2009 में कुमार कुछ समय के लिए कांग्रेस प्रवक्ता भी रहे। हालांकि एक विवाद के चलते उन्हें इस पद से भी हटना पड़ा था।
2010 में तीसरी बार राज्यसभा का सदस्य चुने जाने के बाद उन्हें संसदीय राज्य मंत्री का पद सौंपा गया। जुलाई 2011 में उन्हें योजना मंत्रालय, विज्ञान और प्रौद्योगिकी तथा साइंस मंत्रालयों का राज्यमंत्री नियुक्त किया गया।
अक्तूबर 2012 में उन्हें सलमान खुर्शीद की जगह देश का कानून मंत्री बनाया गया। इस पद पर रहते हुए उन पर कोल ब्लॉक आवंटन मामले में सीबीआई की रिपोर्ट बदलवाने का आरोप लगा। कोयला मंत्रालय कुछ समय के लिए प्रधानमंत्री के पास भी रहा है।
एलएलबी और एमफिल डिग्री धारी कुमार ने दिल्ली के प्रसिद्ध सेंट स्टीफन कॉलेज से अपनी शिक्षा हासिल की। सुप्रीम कोर्ट में वरिष्ठ वकील रहे कुमार 1991 में देश के एडिशनल सॉलिसिटर जनरल बने।