दिल्ली की सियासत गिरगिट जैसी हो गई है। हर दिन नया रंग दिख रहा है। अंदरखाने से उठी रही मुखालफत की आवाजों को खामोश कर भाजपा आलाकमान ने वाकई में किरण बेदी को कमान सौंप दी।
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ये तय हो गया है कि दिल्ली के राजनीतिक अखाड़े में अरविंद केजरीवाल का मुकाबला तेजतर्रार किरण बेदी से होगा। भाजपा ने किरण बेदी को मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार बनाया है। उन्हें कृष्णानगर सीट से टिकट दिया गया है।
कृष्णानगर भाजपा के कद्दावर नेता हर्षवर्धन की सीट है। वह उस सीट से पांच बार विधायक रह चुके हैं। फिलहाल चांदनी चौक से लोकसभा सदस्य और केंद्रीय मंत्री हैं। कृष्णानगर किरण बेदी के लिए सुरक्षित सीट मानी जा रही है और ऐसे में उनका विधानसभा में जाना लगभग तय है।
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विरोध के सुरों को आलाकमान ने कुचला
छह दिन पहले किरण बेदी भाजपा में शामिल की गई, तो ऐसे कहा गया कि मुख्यमंत्री पद का चेहरा भी वहीं होंगी। उनकी बॉडी लैंग्वेज, बोलने का अंदाज और कार्यकर्ताओं से मुलाकात का तरीका देखकर राजनीति जानकारों ने ऐसे कयास लगाए।
हालांकि इस राय के विरोधियों ने कहा कि आरएसएस में ऐसी परिपाटी नहीं रही है कि चंद दिनों पहले पार्टी में शामिल हुए किसी नेता को इतना बड़ा ओहदा दे दिया जाए। भाजपा में विरोध के सुर भी उठे।
दिल्ली की राजनीति में भाजपा के पुराने दिग्गज जगदीश मुखी ने संघ कार्यकर्ता के रूप में अपने अनुभवों का हवाला देते हुए कहा कि किरण बेदी को भाजपा में शामिल होने से पहले हमसे पूछा भी नहीं गया। हालांकि आलाकमान ने ऐसे आपत्तियों और नारजगियों को दरकिनार कर किरण बेदी को मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार बना दिया।
भाजपा को क्यों बदलनी पड़ी रणनीति
अब सवाल यह है कि आलाकमान को ऐसा करने की जरूरत क्या पड़ गई? लोकसभा चुनावों में जीत के बाद हुए सभी विधानसभा चुनावों में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ही भाजपा का चेहरा थे। उन्हीं के बूते तीन राज्यों में पार्टी ने सरकार भी बना ली थी।
दिल्ली में भी चंद दिनों पहले तक वही चेहरा थे। पार्टी नेतृत्व और हर खास-ओ-आम कार्यकर्ता भी यही कह रहा था कि भाजपा मोदी के नेतृत्व में ही चुनाव लड़ेगी। फिर क्या हुआ कि भाजपा को रणनीति बदलनी पड़ी?
दरअसल जानकारों का मानना है कि भाजपा ने अपनी रणनीति पर पुनर्विचार 10 जनवरी को रामलीला मैदान में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की रैली के बाद करना शुरु किया।
मोदी की फ्लॉप रैली कारण तो नहीं
रामलीला मैदान की रैली में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने दिल्ली में विधानसभा चुनावों का शंखनाद किया था। भाजपा की स्थानीय इकाई उस रैली के जरिए प्रधानमंत्री मोदी के समक्ष अपनी शक्ति का प्रदर्शन भी करना चाहती थी। लेकिन ऐसा हो न सका।
भाजपा ने रामलीला मैदान में एक लाख से अधिक लोगों की भीड़ जुटाने का लक्ष्य रखा था, लेकिन वहां 20 से 22 हजार लोग ही जुट पाए। जानकारों का कहना है कि भाजपा नेतृत्व ने उसी समय मान लिया था कि दिल्ली के रण के लिए नए सिरे नीति बनाने की आवश्यकता है।
आम आदमी पार्टी ने भी ये आरोप कई बार लगाया कि रामलीला मैदान की रैली फ्लॉप होने के बाद भाजपा किरण बेदी को पार्टी में लेकर आई।
मोदी के फेस सेविंग का तरीका भी
आम आदमी पार्टी का कहना है कि भाजपा ने अपने पक्ष में लहर बनाने के लिए पहले सभी सांसदों को उतारा। वह प्रयोग फ्लॉप रहा। उसके बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की रैली की। वह प्रयोग भी नहीं चल सका। जिसके बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को हार की आंच से बचाने के लिए किरण बेदी को सामने लाया गया।
लोकसभा चुनावों के बाद से मोदी के चेहरे के बदौलत भाजपा लगातार जीत दर्ज कर रही थी। और किसी भी कराण से दिल्ली चुनावों के नतीजे भाजपा की योजनाओं के माकूल नहीं होते तो खरोंच मोदी के चेहरे पर ही आती।
वह खरोंच किसी और के चेहरे पर आए, इसलिए बेदी को सामने लाया गया। दरअसल यह भाजपा की नहीं मोदी की 'फेस-सेविंग' का तरीका है।
कुनबे की रार थामने की कोशिश भी
भाजपा के कुनबे में भी कम रार नहीं है। पार्टी पिछले विधानसभा चुनावों से ही कई गुटों में बंटी हुई है। कई बार ये गुटबाजी सतह पर भी आई है। जानकारों का कहना है कि स्थानीय भाजपा इकाई के अध्यक्ष सतीश उपाध्याय को भी आलाकमान ने कभी ये भरोसा नहीं दिया कि भाजपा जीती तो वे मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार होंगे।
अध्यक्ष के रूप में उपाध्याय की नियुक्ति राजनाथ सिंह ने की थी। उन्हें दिल्ली के पुर्वांचली समुदाय का नेता ही अधिक माना जाता है। कई पुराने नेताओं में उपाध्याय को लेकर कसमसाहट थी, विशेषकर पंजाबी और बनिया लॉबी में।
मोदी ओर शाह की चिंता चुनावों के पहले भाजपा के कुनबे को दुरूस्त रखना भी था। किरण बेदी इस लिहाज से बेहतर विकल्प हो सकतीं थी। और पार्टी ने ऐसा किया। वैसे किरण बेदी को लाने में अरुण जेटली और विजय गोयल ने अहम भूमिका निभाई।
राजनीतिक पटल पर किरण बेदी के उभार को आम आदमी पार्टी के खिलाफ आम आदमी पार्टी के उभार के रूप में भी देखा जा रहा है। दरअसल किरण बेदी भी उस आंदोलन का बड़ा चेहरा रही हैं, जिस आंदोलन की उपज आप है।
अन्ना हजारे के नेतृत्व में हुए भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन के कारण ही आप का जन्म हुआ। किरण बेदी शुरु से ही राजनीतिक दल बनाने की विरोधी रहीं, आप के गठन के बाद उन्होंने उसका खुलकर विरोध भी किया।
हालांकि केजरीवाल की छवि और भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन की विरासत के कारण आप दिल्ली में भाजपा पर हावी रही। किरण बेदी को नेतृत्व सौंपकर भाजपा ने उस विरासत को ही अपने पक्ष में भुनाने की कोशिश की। केजरीवाल के ईमानदार चेहरे के सामने बेदी के रूप में एक बेदाग चेहरा भी रखा।