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'आम आदमी' का मुख्यमंत्री तक का सफर

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छोटे से कद का एक साधारण सा दिखने वाला आदमी। गर्मियों में पैंट के ऊपर आधी बाजू की ढीली ढाली शर्ट पहनता है तो ठंड में नीले रंग का स्वेटर और गले में सामान्य सा मफलर। कभी प्लेटफॉर्म पर सो जाता है तो कभी आम लोगों के साथ सड़क पर होता है।
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कभी वह पुलिस का थप्पड़ खाता है तो कभी सड़क से पुलिस घसीटते हुए ले जाती है। 45 साल के इस शख्सियत को लोग अरविंद केजरीवाल कहते हैं। यह शख्स कभी इनकम टैक्स विभाग में अधिकारी हुआ करता था, लेकिन यह कब दिल्ली का मुख्यमंत्री बन गया, दूसरे दलों को पता तक नहीं चला।

हरियाणा के हिसार के सीवानी मंडी में 16 अगस्त 1968 को जन्माष्टमी के दिन अरविंद केजरीवाल का जन्म हुआ। इसलिए उनके पिता गोविंद राम केजरीवाल और गीता देवी उन्हें प्यार से किशन बुलाते थे। अरविंद ने हिसार से ही हाईस्कूल तक की पढ़ाई पूरी की।
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आईआईटी छात्र से मैकेनिकल इंजीनियर

उसके बाद आईआईटी खड़गपुर से मैकेनिकल इंजीनियरिंग करने के बाद कुछ समय टाटा स्टील में नौकरी की। 1989 में वह टाटा स्टील से जुड़े और वर्ष 1992 में कंपनी को अलविदा कह दिया।

1995 में अरविंद इंडियन रेवेन्यू सर्विस के लिए चुने गए। बताते हैं कि यूपीएससी में इंटरव्यू देने से पहले वे कोलकाता गए थे। वहां उनकी मुलाकात मदर टेरेसा से हुई। अरविंद ने कालीघाट पर काम किया और शायद यहीं से उन्हें दूसरों के लिए जीने का नजरिया मिला।

इनकम टैक्स डिपार्टमेंट में असिस्टेंट कमिश्नर

ट्रेनिंग के बाद केजरीवाल दिल्ली में इनकम टैक्स डिपार्टमेंट में असिस्टेंट कमिश्नर बने। यहां ज्वाइन करने के बाद उन्होंने अपने लिए खुद नियम बनाए। ऑफिस में अपनी टेबल को खुद साफ करते। किसी काम के लिए चपरासी नहीं बुलाते थे।

यहां नौकरी करते हुए ही केजरीवाल ने विभाग में भ्रष्टाचार के खिलाफ मुहिम शुरू कर दी। आईआरएस सेवा के प्रशिक्षण के दौरान ही केजरीवाल ने अपनी बैचमेट सुनीता से शादी कर ली। उनके एक बेटा और एक बेटी है।

परिवर्तन से शुरु हुआ 'परिवर्तन' का सफर

अरविंद ने वर्ष 2000 में परिवर्तन नाम से एनजीओ शुरू किया। परिवर्तन के जरिए उन्होंने देश भर में सूचना के अधिकार का अभियान चलाया। बिल बेशक केंद्र सरकार ने पारित किया हो, लेकिन जनता के बीच जाकर उन्हें जागृत करने का जिम्मा अरविंद और उनके परिवर्तन ने उठाया।

अरविंद को ‘सूचना का अधिकार’ पर काम के लिए 2006 में एशिया का नोबल पुरस्कार कहा जाने वाला रेमन मैग्सेसे अवार्ड मिला। इसके बाद परिवर्तन के जरिए ही जनलोकपाल की लड़ाई आगे बढ़ी। उन्होंने फरवरी 2006 में नौकरी से इस्तीफा देकर पूरा समय परिवर्तन को दे दिया।

इसके बाद देश में शुरू हुआ भ्रष्टाचार के खिलाफ सबसे बड़ा आंदोलन। अन्ना के साथ मिलकर शुरू हुए आंदोलन को जनसमर्थन तो पूरा मिला, लेकिन जनलोकपाल बिल नहीं बन पाया।

अन्ना के साथ आंदोलन की राह

फिर केजरीवाल ने राजनीति में आने का फैसला किया। यहीं से अन्ना और केजरीवाल के रास्ते जुदा हो गए, लेकिन वे अन्ना के बिना भी आगे बढ़ते गए।

26 नवंबर 2012 को केजरीवाल ने आम आदमी पार्टी की घोषणा की। महज एक साल पहले पैदा हुई आम आदमी पार्टी ने दिल्ली में भाजपा को कड़ी टक्कर दी, वहीं कांग्रेस का सूपड़ा ही साफ कर दिया।

पहले ही चुनाव में केजरीवाल ने मुख्यमंत्री शीला दीक्षित के खिलाफ चुनाव लड़ने की घोषणा करके सबको चौंका दिया। राजनीतिक पंडित उनके इस फैसले को लेकर आश्चर्यचकित थे।

चर्चा होने लगी की केजरीवाल ने अपना राजनीतिक सफर शुरू होने से पहले खत्म कर लिया।
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दिल्ली की सत्ता का सुल्तान केजरीवाल

लाख आलोचनाओं के बाद केजरीवाल ने अपने राजनीति के नए स्टाइल से चुनाव लड़ा और दिल्ली के बड़े-बड़े नेताओं को चुनावी पटखनी दी।

जो आलोचक उनकी राजनीति पर सवाल उठा रहे थे तो दिसंबर में हुए विधानसभा चुनाव में उन्होंने सभी को गलत साबित कर दिया।

नई दिल्ली विधानसभा सीट से दीक्षित को 25 हजार से अधिक मतों से हराया और उनकी पार्टी ने 28 सीटें हासिल कीं। अब वह दिल्ली की सत्ता में काबिज होने जा रहे हैं।
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