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मोदी को वाराणसी की जनता क्यों नहीं देगी वोट, केजरीवाल ने बताया

Mon, 12 May 2014 08:52 AM IST
एमके वेणु/अमर उजाला, वाराणसी
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आम आदमी पार्टी के संयोजक और दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल का मानना है कि ईमानदारी की बात लोगों के दिल को छू जाती है। यह चुनाव ‘आप’ की नहीं, बल्कि यह आम आदमी की लड़ाई है।
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उन्होंने कहा कि जब हम शुरुआत में काशी गए तो लोगों को लग रहा था कि केजरीवाल अपनी जमानत गंवा देगा। मगर बाद में लोगों ने कहना शुरू कर दिया कि टक्कर तो बराबर की है और अब तो लोगों को लगने लगा है कि ये अब जीत सकते हैं। हमने अपने कैंपेन में सच्चाई और ईमानदारी की राजनीति कायम करने की बात की। हम नफरत की राजनीति को प्यार और मुहब्बत की राजनीति से मात देना चाहते हैं।

इसके साथ ही कई मुद्दों पर अमर उजाला के एमके वेणु को दिए इंटरव्यू में केजरीवाल ने बेबाकी से अपनी राय रखी।

सवाल: आप का चुनाव प्रचार पिछले हफ्तों में कैसा रहा, खास तौर पर नौ मई को हुआ शानदार रोड शो। बड़े ही नाटकीय ढंग से आपने एक महीने में अपने चुनाव प्रचार अभियान में तेजी लाई। आखिरकार आपने यह सब कैसे किया?

केजरी: जब मोदी जी ने ऐलान किया कि वह काशी से चुनाव लड़ेंगे, उसके कुछ दिन बाद ही मैने घोषणा की कि मैं भी उनके खिलाफ वाराणसी से चुनाव लडूंगा। तब उस समय लोगों को लग रहा था कि केजरी चार या पांच लाख वोटों से हारेगा, जमानत खो देगा। उसके बाद हम काशी आए और हमने चुनाव प्रचार किया। हमारा कैंपेन यही है कि हम सच्चाई और ईमानदारी की राजनीति कायम करने की बात करते हैं, नफरत की राजनीति को प्यार और मोहब्बत की राजनीति से हराना चाहते हैं।

जब मैं नामांकन भरने 23 अप्रैल को गया, तब तक काफी माहौल बदल चुका था। जिस तरह वो रोड शो हुआ था, उसकी किसी को उम्मीद नहीं थी कि वो रोड शो भी उतना बड़ा हो सकता है, बड़ी संख्या में लोग आए थे। हम लोगों को लेकर नहीं आए थे, भाजपा तो बाहर से बहुत से लोगों को लेकर आई थी। हमारे पास तो पैसे ही नहीं थे लोगों को लाने के लिए। तब तक लोगों ने कहना शुरू कर दिया था कि टक्कर तो बराबर की है। अब पिछले एक हफ्ते में माहौल बदला है। अब लोगों को लगने लगा है कि हां अब ये जीत सकते हैं। ये जीत रहे हैं।

पिछले छह दिन रोहनियां और सेवापुरी गांव में रहकर आया हूं। वहां और शहर के अंदर भी बहुत सकारात्मक माहौल है। यहां तक कि भाजपा के समर्थक भी बदल रहे हैं। वे कह रहे हैं कि पिछले 20 साल में नगर निगम, विधायक और सांसद भाजपा के रहे हैं। फिर भी भाजपा ने कुछ नहीं किया। पिछले पांच सालों में मुरली मनोहर जोशी की शक्ल देखने को नहीं मिली। ऐसा न हो कि मोदी जी को वोट दे दें। ये तो चुनाव के पहले ही दो घंटे के लिए आए हैं, चुनाव के बाद अता-पता नहीं होगा। वैसे भी जीतने के बाद वडोदरा चले जाएंगे। कहीं ऐसा न हो कि हमारे साथ धोखा हो जाए।

सवाल: मोदी को प्रधानमंत्री उम्मीदवार के रूप में आगे बढ़ाना चुनाव पर कितना असर डालेगा?

केजरी: हां, ये महत्वपूर्ण है। कई लोगों को लगता था कि अगर प्रधानमंत्री यहां से बनेगा तो यहां का विकास होगा। मैंने कहा कि आजादी से लेकर आज तक देख लो, अगर किसी पीएम ने अपने लोकसभा क्षेत्र पर ध्यान दिया हो तो। उल्टा टाइम ही नहीं मिलता अपने क्षेत्र में जाने के लिए। फिर शास्त्री जी इलाहाबाद से लडे़ थे, इंदिरा गांधी रायबरेली से लड़ती थीं, वहां का भी बुरा हाल रहा। राजीव गांधी जी अमेठी से लड़ते थे, वो तो सबसे पिछड़ा इलाका है।

अटल बिहारी वाजपेयी लखनऊ से लड़ते थे, वहां का बुरा हाल है। पीएम का निर्वाचन क्षेत्र होने से विकास नहीं होता, विकास होता है, ऐसे आदमी को वोट देने से जो आपके बीच का आदमी हो। जो आपके बीच रहता हो। जो हेलीकॉप्टर से दो साल में या दो घंटे के लिए आए, उसे वोट देकर आपका विकास कभी नहीं होने वाला। ये समझाना पडे़गा राजनीति में लोगों को, ये संदेश जाने लग गया है।

हमारे पक्ष में यह संदेश पिछले महीने से असर डाल रहा है? हर जगह तर्क काम नहीं करता है। लोग कहते हैं कि ये लड़का तो हमारे बीच घूमता है। ढाबे पर चाय पीते हुए मिलता है। इससे बात कर सकते हैं। हाथ मिला सकते हैं। दो गालियां भी दे सकते हैं। सवाल भी पूछ सकते हैं। वह आसानी से सुलभ है। वो सबसे ज्यादा क्लिक कर रहा है यहां।

सवाल: आपने राजनीति में अंबानी, अदाणी और बड़ी पूंजी की भूमिका के बारे में प्रचार किया। लोग उसको कितना समझ पाए हैं?

केजरी: हम दो बातें कह रहे हैं। पहला कि इनकी एक जेब में कांग्रेस और दूसरी में भाजपा है। सब मिले हुए हैं। वोट लेंगे आपसे और नौकरी करेंगे अंबानी और अदाणी की। अगर वोट इन्हें दिया तो चुनाव के बाद गैस के दाम चार गुना होने वाले हैं। पेट्रोलियम मंत्री मोइली ने संकेत भी दिया है। रिलायंस ने धमकी दी है, इसकी पेपर कटिंग हमने लोगों को दिखाई। चुनाव खत्म होंगे 16 तारीख को और 17 तारीख को ये गैस के दाम चार गुना बढ़ा देंगे।

दूसरा, गुजरात में किसानों की जमीन छीन-छीन कर मोदी जी ने अदाणी को एक रुपये प्रति वर्ग मीटर में दे दी है (4500 रुपये प्रति एकड़)। उसका कागज दिखा देते हैं लोगों को। वहां, असल में पांच लाख रुपये प्रति एकड़ और दस लाख रुपये प्रति एकड़ का रेट है। और जो जमीन शहर के पास है, उसका तो रेट 50 लाख रुपये प्रति एकड़ है। गुजरात का पूरा तटीय इलाका छीनकर मोदी जी ने बड़ी कंपनियों को एक रुपये प्रति वर्ग मीटर के हिसाब से दे दी है। हम लोगों को समझाते हैं कि मोदी को वोट देने से पहले सोचो कि तुम्हारा अस्तित्व खतरे में पडे़गा।

सवाल: एक चैनल के इंटरव्यू में मोदी ने कहा है कि तटीय इलाके में तो दलदली इलाका है, उस जमीन का मूल्य कुछ भी नहीं है। इसलिए उसे एक रुपये प्रति वर्ग मीटर या सस्ते में दिया है। कंपनियां उस दलदली जमीन को पाटकर तैयार करती हैं?

केजरी: वो दलदली जमीन तो छोटा इलाका है। मोदी जी ने कहा है कि पूरा तटीय इलाका दे दिया है। तर्क के लिए उन्होंने दलदली जमीन का हवाला दिया है। यह एक अपवाद हो सकता है। और अन्य इलाकों में जहां एक रुपये वर्ग मीटर के हिसाब से जमीन दी है, वहां के सर्किल रेट ही 700 रुपये प्रति वर्ग मीटर है। तो मार्केट रेट तो और भी ज्यादा होगा।

सवाल: इस चुनाव का ध्रुवीकरण सांप्रदायिक और जातिगत हुआ है। खासकर यूपी में। आपकी राजनीति की शुरुआत में दिल्ली में इन सब चीजों से ऊपर उठकर भ्रष्टाचार या सुशासन के मुद्दे पर हुई है। यूपी की जाति और संप्रदाय की राजनीति किस ढंग से ले रहे हैं?

केजरी: एक ही चीज इसको तोड़ सकती है-प्यार और मोहब्बत का पैगाम। जब नफरत की राजनीति होती है तो धर्म के नाम पर लोगों को बांटा जाता है। जब आप लोगों के बीच जाकर प्यार और मोहब्बत की बात करते हैं तो वो ऐसी सच्चाई का संदेश है जो हर इंसान के दिल में झनझनाहट पैदा करता है। बस वही एक तरीका है। दिल्ली में भी यही हुआ कि हिंदू-मुस्लिमों के बीच की दीवारें टूटती थीं। सबको यह संदेश अच्छा लग रहा है। आप लोगों के दिल को छूते हैं, जब आप ईमानदारी से बात करते हैं।

सवाल: क्या ये ध्रुवीकरण आप को भी ध्रुवीकरण की राजनीति की तरफ खींच नहीं रहा। नरेंद्र मोदी के डर से वाराणसी के मुस्लिम ऐसा नेता चाहते हैं जो इन्हें सुरक्षा दे सके, सोच रहे हैं कि वोट किस को दे। कांग्रेस, आप या सपा। आप इस स्थिति को किस तरह से देखते हैं?

केजरी: इस बात में दम है कि मुस्लिम मोदी को वोट नहीं देना चाहता है। उसको वोट देना चाहता है, जो मोदी को हराने की दौड़ में सबसे आगे है। लेकिन हिंदू किसको वोट देना चाहता है। हिंदुओं में अलग अलग जातियां हैं। वो किसको वोट देना चाहते हैं। उनके लिए तो मोदी को हराने का फैक्टर नहीं है। उनमें से बड़े समुदाय आ रहे हैं हमारी तरफ मसलन ब्राह्मण, पटेल, बनिया, कुर्मी और ओबीसी। गांव में भी और शहर में भी आ रहे हैं।

सवाल: सोलह लाख वोटरों की बात हो रही है वाराणसी में। अगर साठ फीसदी वोटिंग भी हुई तो समझिए करीब दस लाख वोट पड़े। उसमें कह रहे हैं कि करीब 50 फीसदी ओबीसी हैं। आप ओबीसी वोटरों को किस ढंग से लिए हैं।

केजरी: मैं फिर से कहूंगा कि हम इसको जाति-धर्म के हिसाब से नहीं देख रहे हैं। हम अपना संदेश लेकर जाते हैं जो सबको पसंद आ रहा है। खासकर ओबीसी, ब्राह्मण और बनिया समुदाय को। थोड़ा फर्क इतना है कि कुछ जाति में मोदी जी को लेकर ज्यादा और कुछ में कम सहानुभूति है। जहां सहानुभूति ज्यादा है, वहां लोगों के दिल से मोदी जी को निकालने में ज्यादा प्रयास करना पड़ेगा।

सवाल: आपके हिसाब से किन जातियों में मोदी के प्रति कम सहानुभूति हो सकती है। जो लोग सपा और बसपा के साथ रहे हैं उनमें शायद कम सहानुभूति है। पिछले कुछ दिनों में मोदी जी भी अपनी जाति का ढिंढोरा पीट रहे हैं?

केजरी: सब कुछ कोशिश कर चुके हैं। ये उनकी बौखलाहट दिखाती है। पहली बात तो वडोदरा और यहां से चुनाव लड़ रहे हैं। लोगों को लग रहा है कि 16 को जीत जाएंगे तो 17 को वडोदरा चले जाएंगे। क्योंकि गुजरात की राजनीति नहीं छोड़ सकते। मान लीजिए वो पीएम नहीं बनते और एक अफवाह फैलाई जा रही है कि वे वाराणसी रखेंगे और वडोदरा छोड़ेंगे। अगर वाराणसी रखते हैं और पीएम नहीं बनते हैं तो क्या वह मुख्यमंत्री का पद छोड़ देंगे। उनका वाराणसी छोड़ना तो लगभग तय है। तो ऐसे में लोग सोच रहे हैं कि उन्हें वोट देने का क्या फायदा। कुल मिलाकर यह है कि एक माह में वाराणसी में दोबारा चुनाव होना है।

सवाल: आपकी नजर में इस चुनाव में किस तरह का जनादेश आएगा?

केजरी: चुनाव में खंडित जनादेश आएगा। भाजपा को 160 से ज्यादा सीटें नहीं मिल रही है। एक दुर्भाग्य यह रहा है कि मीडिया बहुत बड़े पैमाने पर बिक गया है। एक जो पैसे पे बिका, एक जो डर गया कि मोदी जी भूलते नहीं है। जैसे 17 अप्रैल को चुनाव हुआ और उसके दो दिन पहले एक टीवी चैनल ने एनडीए की 275 सीट दिखाई। इस तरह की बेईमानी मैंने कभी नहीं देखी। अब 12 मई को चुनाव है। 9 मई को एक और टीवी चैनल ने दिखाया है कि वाराणसी में मोदी जी के अलावा सबकी जमानत जब्त हो रही है। हर कोई मोदी को प्रसन्न करने में लगा है। लेकिन मेरा मानना है कि इस तरह के सारे आकलन गलत है। भाजपा को 160 से ज्यादा सीटें नहीं मिलेंगी। जो भी सरकार बनाता है वह एक साल से ज्यादा नहीं चल पाएगा। एक साल के भीतर दोबारा चुनाव होंगे। तक हम देखेंगे, क्या होता है।

सवाल: यूपी में भाजपा को कितने सीटें आएंगी?

केजरी: 25 से ज्यादा सीटें नहीं आएंगी। यह भाजपा का अपना आकलन भी है।

सवाल: और आप का क्या होगा?
केजरी : कह नहीं सकते। जैसे दिल्ली के बारे में हम कुछ नहीं कह पाए थे ठीक इसी तरह लोकसभा चुनाव के बारे में कुछ भी नहीं कहा जा सकता। वास्तव में हम लोग बड़े नेता नहीं हैं। आम आदमी हैं जो खड़े हो गए हैं। दिल्ली में बहुत साधारण लोग थे। वो चुनाव कैसे जीते। चुनाव वो नहीं लड़े थे। चुनाव जनता लड़ी थी। जनता का गुस्सा निकला था।

सवाल: पिछले दिनों चुनाव आयोग के साथ भाजपा की काफी तू-तू, मैं-मैं हुई। दूसरी पार्टियों को भी आयोग से दिक्कत है। आपका क्या कहना है?

केजरी: चुनाव आयोग भाजपा के साथ काफी नरमी बरत रहा है। चुनाव आयोग की भूमिका को दो हिस्से में बांटा जा सकता है- पहली भूमिका स्थानीय डीएम निभा रहे हैं। दूसरी भूमिका केंद्र चुनाव आयोग के मुख्य आयुक्त की है। स्थानीय डीएम प्राजंल यादव बिल्कुल ठीक काम कर रहे हैं। जब से आए हैं डीएम बन कर, वाराणसी में लोग बहुत खुश हैं। लेकिन भाजपा उनका तबादला चाहती है। भाजपा ने पिछले 15 साल में वाराणसी में कुछ नहीं किया। अब एक इंसान जो कुछ कर रहा है, उसका वो तबादला चाहते हैं। हालांकि मुख्य चुनाव आयुक्त भाजपा के साथ काफी नरमी बरत रहे हैं। मिसाल के तौर पर ‘एनडीटीवी’ ने 17 अप्रैल को मतदान से ठीक पहले एक तरह से एक्जिट पोल ही दिखा दिया। हमने चुनाव आयोग में उनके खिलाफ शिकायत की। चुनाव आयोग ने कहा हां, यह गलत है। लेकिन उन्होंने कुछ नहीं किया। 24 अप्रैल को चुनाव के अगले चरण के दौरान चैनलों ने मोदी के नामांकन को लगभग छह घंटे तक लाइव दिखाया। वह चुनाव को प्रभावित करने की कोशिश कर रहे थे। नौ मई को जब हमें ‘आज तक’ के पोल का पता चला तो हम उसी दिन चुनाव आयोग गए। लेकिन उन्होंने कोई कदम नहीं उठाया।

सवाल:माना जा रहा है कि केंद्र में एक कमजोर गठबंधन की सरकार होगी? ऐसे में अगले तीन-चार साल में आम आदमी पार्टी का विजन क्या होगा?

केजरी: राजनीति में भविष्यवाणी करना बेहद कठिन है। हम अपनी स्ट्रेटजी कम बनाते हैं, देश की स्ट्रेटजी के बारे में ज्यादा सोचते हैं। मैं अभी इतना ही कह सकता हूं कि हम आखिरी वक्त तक लड़ने को तैयार हैं।

सवाल: मैं इसे दूसरी तरह से समझाता हूं। आपने बेहद कम वक्त में एक ढर्रे की राजनीति के  लिए इन्फ्रास्ट्रक्चर खड़ा करने की कोशिश की। दिल्ली से अब आप पूरी देश की ओर बढ़े हैं। क्या आपको नहीं लगता है कि यहां-वहां बिखरने की तुलना में आपको अपने कैडरों के इन्फ्रास्ट्रक्चर को मजबूत बनाना चाहिए। आप अपनी राजनीतिक लड़ाई का मैदान लगातार बदल रहे हैं और अपने वालंटियर्स को भी अपने साथ ले जा रहे हैं? आखिर ज्यादा स्थायी स्ट्रक्चर क्या होना चाहिए?

केजरी: स्ट्रक्चर तो उभरता है। इसे ऊपर से नहीं थोपा जा सकता। दूसरी बात यह है कि यह आंदोलन विचारों पर खड़ा है। यह किसी ढांचे पर खड़ा नहीं है। अगर ‘आप’ स्ट्रक्चर्ड बेस होती तो हम नहीं खड़े हो पाते इन बड़ी पार्टियों के सामने। क्या स्ट्रक्चर, क्या रिसोर्सेज, क्या ऑर्गेनाइजेशन इन बड़ी पार्टियों के पास है- कांग्रेस जैसी 100 साल से पुरानी पार्टी के पास। या भाजपा जैसी पार्टी के पास। हमारे पास स्ट्रक्चर भी नहीं है और रिसोर्सेज भी नहीं है। ये पूरा आइडिया बेस्ड है। यहां वाराणसी में एक महीने में हमने चुनाव इन लोगों के बराबर लाकर खड़ा कर दिया है। वो कैसे किया? बीजेपी जैसी पार्टी लगातार 30 साल से नगर निगम का चुनाव जीत रही है। उनके तीन एमएलए हैं यहां। गली-गली में इकाईयां हैं। सांसद पिछले दस साल से हैं। एक महीने में अगर उन्हें चैलेंज किया है तो केवल आइडिया के लेवल पर। ये पूरा विचारों का आंदोलन है। उसी में से स्ट्रक्चर इवॉल्व होंगे। कैडर भी इवॉल्व होंगे। अगर आप स्ट्रक्चर को स्टिफ बनाओ, वो कई बार एनर्जी खत्म कर देता है। लूज रखो थोड़ा तो लीडरशिप इवॉल्व होती है। कुछ स्टेट्स में हमने कमेटी बनाई, लेकिन कमेटी वाले नेता बनकर बैठ गए। इसलिए बेहतर है की सब डिजॉल्व कर दो। अपने आप लीडरशिप इवॉल्व होगी। लीडर्स निकलेंगे। इसे समय दो।

सवाल: आप दिल्ली में चुनाव कब होने की उम्मीद कर रहे हैं? आखिर आपकी पहली लहर तो दिल्ली में ही दिखी थी?

केजरी: हम तुरंत इलेक्शन चाहते हैं। हमने सुप्रीम कोर्ट में केस भी डाला है। लेकिन दोनों बड़ी पार्टियां मान नहीं रही हैं। दिल्ली के मामले में ज्यादा से ज्यादा एक साल देर कर सकते हैं।

सवाल: हाल में एक इंटरव्यू में आपने कहा कि दिल्ली का मुख्यमंत्री पद छोड़ कर आपने गलती की?
केजरी: दरअसल जिस अखबार को इंटरव्यू दिया उसने इसे अपने हेडलाइन में गलत तरीके से पेश किया। हमने इस्तीफा देकर गलती नहीं की। हमने इस्तीफे की वजहों को ठीक तरह से लोगों को बताने में गलती की। सरकार बनाने से पहले दस दिनों के भीतर हमने 280 सभाएं की। जनता से पूछे बगैर अगर कांग्रेस का समर्थन लेते तो राजनीतिक रूप से खत्म हो जाते। जनता ने कहा समर्थन लो। तो इस्तीफा देने से पहले भी हम दस दिन तक सभाएं करते तो जनता कह सकती थी कि हमें इस्तीफा दे देना चाहिए। हमने सोचा लोग हमारे इतने बड़े बलिदान को समझेंगे। लेकिन हमें इसका अहसास नहीं था कि दूसरी पार्टियां इसका फायदा उठा लेंगी। इस चुनाव में भी हम दिल्ली में चार या पांच सीटें जीतेंगे।

सवाल:आम आदमी पार्टी 413 लोकसभा सीटों पर लड़ रही है? क्या इससे आपके संसाधन बिखर नहीं रहे हैं?

केजरी: हमारे तो रिसोर्सेस ही नहीं हैं। बिखरने की तो बात ही नहीं है। हमने आदमी खड़े कर दिए हैं। आदमी भी वहीं के लोग हैं। हमने प्लेटफार्म दिया है। अब देश के लोग चुनाव लड़ेंगे और लड़ाएंगे। हम पूरे देश में अच्छे लोगों को जोड़ने की कोशिश कर रहे हैं।

सवाल: क्या आप विकेंद्रीकरण मॉडल की बात कर रहे हैं?

केजरी: यह अरविंद केजरीवाल की लड़ाई नहीं है। न ही यह आम आदमी पार्टी की लड़ाई है। यह देश की जनता की लड़ाई है। इसलिए जनता के हाथ में लगाम दो। दिल्ली मॉडल क्या है? हम लोग चुनाव नहीं जीते, जनता जीती थी। जनता घर-घर गई, अपने पैसे खर्चे, प्रयास किया। उन्हें लग रहा है कि देश में एक अच्छी चीज हो रही है। वो इसका हिस्सा बनना चाहते हैं। यही जनता है। यही वालंटियर्स हैं और यही कैडर हैं। यह उनकी लड़ाई है। हमने एक प्लेटफार्म दिया है। लोग धीरे-धीरे जुड़ते जाएंगे और आंदोलन बढ़ता रहेगा। यह कोई पारंपरिक राजनीतिक यात्रा और लड़ाई नहीं है। अगर हम सोचेंगे कि रिसोर्सेज होगा तभी आगे बढ़ेंगे तो यह संभव नहीं है। तब तक तो देश बचेगा ही नहीं। तो हमने एक प्लेटफार्म दे दिया है। कौन कहां से जीत जाए, कह नहीं सकते। हम कहते हैं कि प्लेटफार्म दो उसमें कंजूसी मत करो। हर जगह खड़े करो। जेब से तो कुछ जा नहीं रहा।
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सवाल: तो जो दिल्ली में किया आपने वही नेशनल लेवल पर भी लागू किया है?

केजरी: बिल्कुल सही। हमारी चिंता केवल यह है कि उम्मीदवार गड़बड़ न हों। शिकायतें आती हैं तो हम निकाल देते हैं। हम एक साफ-सुथरा उम्मीदवार चाहते हैं। कुछ कमजोर होंगे कुछ मजबूत।

सवाल: विचारों के मामले में आपके आदर्श कौन हैं?
महात्मा गांधी। 
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