1987 में सेना ने तात्कालिक प्रधानमंत्री राजीव गांधी की सरकार गिराने का षडयंत्र रचा था। सेना के पश्चिमी कमान में कमांडर रह चुके लेफ्टिनेंट जनरल पीएन हूण ने दावा किया है कि 1987 में राजीव गांधी की सरकार गिराने की साजिश की गई थी। तीन पैरा कमांडो बटालियन, जिनमें पश्चिमी कमांड की बटालियन भी शामिल थी, को दिल्ली कूच करने का आदेश दिया गया था।
उल्लेखनीय है कि 1984 में इंदिरा गांधी की हत्या के बाद राजीव गांधी को प्रधानमंत्री बनाया गया था। उसी वर्ष हुए लोकसभा चुनावों में राजीव गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस ने दो तिहाई से भी ज्यादा सीटें हासिल की थी।
86 साल के हूण ने दावा किया है कि उस समय के सेना प्रमुख जनरल कृष्णास्वामी सुंदरजी और उप प्रमुख लेफ्टिनेंट जनरल एसएफ रोड्रिग्ज ने ये षडयंत्र रचा था। एसएफ रोड्रिग्ज बाद में सेना के प्रमुख बनें। पीएन हूण दिसंबर, 2013 में भाजपा में शामिल हो गए थे।
कांग्रेस के ही कुछ नेताओं के इशारों पर रची गई थी साजिश
हाल ही में प्रकाशित अपनी किताब 'दी अनटोल्ड ट्रूथ' में हूण ने दावा किया है कि राजीव गांधी के तख्ता पलट का षडयंत्र कुछ आला राजनीतिज्ञों के इशारों पर रचा गया था। उन राजनीतिज्ञों के संबंध राजीव से बेहतर नहीं थे।
हूण का कहना है कि 1987 में हुए उनके विदाई समारोह में, जिसकी मेजबानी पंजाब की तात्कालिक राज्यपाल सिद्घार्थ शंकर रे ने की थी, ज्ञानी जैल सिंह ने राजीव गांधी पर भ्रष्टाचार और लापरवाही का आरोप लगाया था। ज्ञानी जैल सिंह ने आरोप लगाया था कि राजीव 1984 में हुए सिख विरोध दंगों को लेकर भी बेपरवाह रहे।
हूण ने दावा किया है कि पश्चिमी कमांड के चीप के रूप में मई-जून 1987 में वे दिल्ली में एक ऑफिसियल दौरे पर थे, उस समय उन्हें एक संदेश मिला कि पश्चिमी कमांड के मुख्यालय में सेना मुख्यालय से एक पत्र आया है, जिसमें तीन पैरा कमांडो बटालियन की सहायता मांगी गई है।
हूण ने साजिश की जानकारी राजीव गांधी को तुरंत दी थी
सेना मुख्यालय की ओर से जो बटालियनें मांगी गई थी, उसमें फर्स्ट पैरा कमांडो जो पश्चिमी कमांड के पास थी, नवीं और दसवीं पैरा कमांडो शामिल थीं। बाद की दोनों बटालियनें उत्तरी और दक्षिणी कमांड के पास थीं।
हूण के मुताबिक उन तीनों बटालियनों को सेना उप प्रमुख एसएफ रोड्रिग्ज के आदेश में रहने को कहा गया था। हूण का दावा है कि उन्होंने तत्काल मामले की जानकारी राजीव गांधी और मुख्य सचिव गोपी अरोड़ा को दी और उन्हें वह पत्र भी दिखलाया।
हूण ने राजीव और गोपी को समझाया था कि तीनों बटालियनों के संबंध में आया सेना मुख्यालय का आदेश कितना खतरनाक साबित हो सकता है और उसके देश को गंभीर परिणाम भुगतने पड़ सकते हैं। हूण ने दावा किया है कि उन्होंने दिल्ली एरिया कमांडर को तुरंत आदेश दिया कि उनके निर्देशों के बिना सेना की एक भी टुकड़ी को इधर से उधर न किया जाए।
राजीव की कैबिनेट के एक मंत्री को थी मामले की जानकारी
हूण अक्टूबर, 1987 में रिटायर्ड हो गए। उन्होंने दावा किया है कि राजीव गांधी की कैबिनेट के एक मंत्री वीसी शुक्ला को सेना की गतिविधियों की जानकारी थी। अपनी किताब के 10वें अध्याय में, जिसका टाइटल है-ज्ञानी जैल सिंह वर्सेज राजीव गांधी'- में हूण ने कहा है कि शुक्ला उनसे मिलने विशेष रूप से चंडीमंदिर में आए थे।
हूण ने अपनी किताब में कहा है कि ज्ञानी जैल सिंह ने राजीव गांधी सरकार के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की क्योंकि उन्हें डर था कि ऐसा करने से सत्ता की शक्ति लोकतांत्रिक ढंग से चुनी गई सरकार से छिनकर सेना के हाथ में चली जाएगी।
टाइम्स आफ इंडिया की खबर मुताबिक, एयर मार्शल रामधीर सिंह हूण के दावों से सहमत नहीं होते। उनका कहना है कि सेना ने कभी भी तख्ता पलट की कोशिश नहीं की। हूण के बयान को उनकी खुद की धारणा बताते हुए कर्नल केएस पाठक ने कहा कि सेना के एक बड़े अधिकारी ने सेना की बटालियनों को दिल्ली में इकट्ठा होने को कहा था, लेकिन वह अन्य कारणों से था।