सेना ने कहा है कि वह जाति, क्षेत्र और धर्म के आधार पर भर्तियां नहीं करती है। हालांकि उसने यह माना है कि प्रशासनिक सुविधा और परिचालन जरूरतों के मद्देनजर एक क्षेत्र के लोगों को लेकर एक रेजिमेंट बनाई जाती है।
दरअसल भाषाई और सांस्कृतिक समानता लड़ाइयां जीतने में मददगार साबित होती हैं। सेना के कामकाज और प्रशानिक ढांचे को भी इससे मदद मिलती है।
थल सेना ने सुप्रीम कोर्ट में एक शपथ पत्र दाखिल कर इस आरोप का जवाब दिया है कि नौसेना और वायुसेना के उलट उसके यहां जाति, क्षेत्र और धर्म के आधार पर भर्तियां नहीं की जाती हैं।
थल सेना के कई रेजिमेंटों मसलन मराठा रेजिमेंट, राजस्थान राइफल्स, डोगरा रेजिमेंट और जाट रेजिमेंट में भर्तियों के समय जाति, धर्म और क्षेत्र को आधार बनाकर भेदभाव किया जाता है।
शपथ पत्र में कहा है कि कानून की ओर से निर्धारित अयोग्य साबित करने वालों मानकों को छोड़ दिया जाए तो कानून देश के सभी नागरिकों को सेना में भर्ती के योग्य मानती है। सेना में लोगों के साथ धर्म, नस्ल, जाति, लिंग, वंश, जन्मस्थान या निवास स्थान के आधार पर कोई भेदभाव नहीं हुआ है।
सेना का यह जवाब हरियाणा में रेवाड़ी के एक डॉक्टर आईएस यादव की याचिका पर दाखिल किया गया है। डॉक्टर ने कहा था कि ड्यूटी सिपाहियों की भर्ती में धर्म, जाति और क्षेत्र को आधार बनाया जाता है और इसे हटाया जाना चाहिए।
सेना में जाति, क्षेत्र और धर्म के आधार पर 22 रेजिमेंट हैं। इस पर सेना के शपथ पत्र में कहा गया कि सिर्फ एक जाति पर रेजिमेंट बनाने का तर्क गलत है।
डोगरा, गढ़वाल राइफल्स या मद्रास रेजिमेंट को जाति आधारित रेजिमेंट नहीं कहा जा सकता। ये रेजिमेंट खास सामाजिक और समूहों के आधार पर बनाई जाती हैं। इनमें भर्तियों का आधार जाति को नहीं बनाया जाता है। इस तरह के वर्गीकरण का एक तार्किक आधार होता है। भर्तियों में जाति के आधार पर कोई भेदभाव नहीं किया जाता है।
सच्चर कमेटी की रिपोर्ट में भी सेना में अल्पंसख्यकों का प्रतिनिधित्व बहुत कम होने पर पहले ही सवाल उठ चुका है। जस्टिस राजेन्द्र सच्चर ने अपनी 403 पन्नों की रिपोर्ट में अल्पसंख्यकों खासकर मुस्लिम समुदाय के कम प्रतिनिधित्व पर उंगली उठाई है।